ना जाने क्यूं
मेरे अंदर इतना शोर है,
कोलाहल है,
मै कही कुछ देर बैठ
इस भीड़ से सुस्ताना चाहता हूं,
लेकिन कहा? पता नही
अगल बगल
कोई पेड़ नही, कोई चिड़ियां नही
बस चल रहा हूं
लेकिन अपने इस चलने से
कुछ बतियाना चाहता हूं
लेकिन
वे बात करने को तैयार नही,
क्योंकि वे खुद मुझ
कुढ़ मगज के इस दिमाग के कीड़े से
वे खुद परेशान सी है
इसकी भी गलती नही,
शुरू शुरू में
इसने कहा तो था,
कि अरे बेवकूफ
चल मैं तेरे साथ चलने को तैयार हूं
इस कंक्रीट के जंगल की घुटन
से दूर,अपने गांव
लेकिन मैंने ही नही सुना
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