Friday, 8 August 2025

ब्रा नहीं देखा

बांग्लादेश के आंदोलन की सबसे घृणित तस्वीर--
(ब्रा नही देखा)

कैसे मान लूं कि इसने 
छत पर सूखता हुआ 
अपनी बहन 
या मां का ब्रा नही देखा.

कैसे मान लूं कि, इस इंकलाबी ने 
कभी बंद दरवाजे की झिर्री से 
अपने अब्बू के हाथों 
अम्मी का खोलकर 
इधर–उधर फेकते 
ब्रा नही देखा.

कैसे मान लूं कि, 
दूसरो की बहनों के दोनों वे 
कैसे कसे है ब्रा में
ये खोलने 
पर कैसे दिखेंगे 
लार बहाता रहा 
लेकिन 
कभी खुद की बहन का
ब्रा से कसा हुआ वे 
कितना है छोटा  
या बड़ा नही देखा .

इसकी 
जम्हूरियत वहा से भाग आई 
लेकिन
हमारे यहां की दोगली सियासत 
इसके साथ है 
जबकि किसी आंदोलन में 
कभी मैंने 
किसी युवा को 
अपनी देश की औरतों के सीने का 
यूं बेहूदगी से लहराते हुए 
ब्रा नही देखा.

कितनी गूंगी हो गई है
स्त्री विमर्श की 
स्त्रियां 
जो बात–बात पर बड़ी स्वच्छंदता से 
इसे बांधती खोलती 
और इसके लिए लड़ती है
शायद! इन्होंने 
अभी किसी कहानी के लिहाज से 
इसके दोनों हाथों में
अपने खुद का 
ब्रा नही देखा.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रचना--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)

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