रफ्तार की मोहब्बत में शायद हम जरीना को इतना दिल दे बैठे कि हम यह भूल बैठे थे कि हर रफ्तार की एक उम्र होती है. जिसे कहीं न कहीं थमना होता है. लेकिन वे रफ्तार हमारी दिल की जरीना ने कुछ यूूँ, थामां की जिसकी चोट और दर्द से अभी तलक मैं नहीं निकल पा रहा. जबकि चोट देते वक्त या हमारी मोहब्बत को दरकिनार करते वक्त भी जरीना की होठों पर वही दिल फरेब मुस्कान थी. जिसने मुझे रफ्तार से दर्द की खाई मैं ढकेल दिया. जरीना कभी हमारे आगोश में घंटो घंटो यूं ही खड़ी रहती थी. उस दरमियां जब वे कुछ बोलती तो लगता जैसे किसी परिंदे ने शाम के धूूँधलके में अपने महबूब दरख़ से कुछ कहा हो.
जरीना को अक्सर में उसकी नीली खूबसूरत आंखों की वजह से नीलोफर भी कहा करता था. वाकई जब उसे मैं नीलोफर कहता उस समय जरीना की आंखों की एक-एक तस्वीर मैं अपनी इन आंखों के कैमरे से खींच अपने दिल के एल्बम में सजाता रहता था.
लेकिन वे कितना मनहूस दिन था. हमारी मोहब्बत का जब जरीना एक लड़के के साथ उसी तरह हँस और खिलखिला रही थी, जैसे कभी मेरे साथ हँसती व खिलखिलाती थी. उस दिन जब मैं उसे देख लौट रहा था, तो जाने क्यों मुझे लग रहा था, कि आज मेरे कांधे पे वे जो कभी अपने सर रखा करती थी, आज उसी कांधे पर जैसे मेरे मोहब्बत के जनाजे का बोझ हो, और मैं उस जनाजे को लिए लौट रहा हूं. कुछ एक दिन यूं ही बीता मैं उसे अजनबी के साथ देखता और लौट आता. मुझे मालूम था कि जरीना कनखियों से अपने मुझे देखती और अपनी नजर फेर लेती है.
1 दिन जरीना खुद मेरे कमरे पर आई. लेकिन उस दिन जो जरीना आई थी, यह वे जरीना नहीं थी, क्योंकि इस जरीना को मेरे उस कमरे से जैसे कोई बदबू सी आ रही हो. कुछ ऐसा ही जरीना ने शो किया. जरीना कितनी बेवफा व बेहया होगी, मैं अब तलक उम्मीद नहीं कर पा रहा रहा था. मेरे मोहब्बत की रफ्तार का यह दिन हमेशा के लिए एक खत्म होती, मोहब्बत का एक्सीडेंट था. जहां रफ्तार नहीं बल्कि आँसू होते हैं. जरीना ने कहा शाहिद-- मैंने सरफराज से निकाह करने का फैसला कर लिया है. उसके पास पैसा घर गाड़ी सब कुछ है, जिससे जिंदगी चलती है. रही तुमसे मोहब्बत करने की बात तो वे ख्वाब थे, जो हम तुम देख रहे थे.
जरीना ने आगे कहा, -" ख्वाब के जितने दिन होते हैं, जैसे हम और तुम जी चुके, अब इससे ज्यादा नहीं जिया जा सकता." मैं तो तुम्हें तभी भूल गई थी. हां तुम भी मुझे जितनी जल्दी भूल जाओगे उतना बढ़िया होगा, मुंह लटका कर आंसू बहा कर रोना चाहो, तो बात अलग है, तुम्हारी मर्जी. जरीना कहे जा रही थी और कहकर जब थमी तो भी कोई शिकन नहीं बस उसने बाय कहा, और मेरी उस कमरे से दूर होती गई, फिर कभी ना आने के लिए. सच आज मैं एक मशहूर शायर तो हूं लेकिन मेरी जिंदगी के --"इस बेमकसद रफ्तार में ना जरीना है, ना नीलोफर."
यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
mo. no. 7800824758
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