त्रिलोकी व उसके कामगार मजदूर साथियों को इस लॉकडाउन के दरमियां , इतने बड़े महानगर में अब ज़हर खाने को भी पैसा नही बचा था. उसपे भी चलो, रह लेते अगर सरकारी दावे के अनुसार उन्हें रूखी-सुखी कुछ भी खाने को मिल जाती, लेकिन नही मिला अंत में मजबूर होकर, त्रिलोकी अपने दस मजदूर साथियों के साथ, किसी तरह इधर-उधर से चंद रोटियों की व्यवस्था कर मुंबई से पैदल ही रेल की पटरियों के किनारे-किनारे अपने-अपने घर चल पड़े.
रेल की पटरियों पे चलते-चलते त्रिलोकी ने कहा- यार! थक गये है, थोड़ा आराम कर लिया जाये, फिर चला जाये. तो सभी साथियों ने त्रिलोकी के हां में हां मिलाई. चूकि पाँव की थकन और मन की थकन त्रिलोकी के सभी मजदूर साथियों पे इतनी हावी थी, कि कहाँ वे बस रेल की पटरी पर हल्का सा आराम करना चाहते थे, लेकिन इस हल्के से आराम भर से उन्हें इतनी गहरी नींद उन पटरीयों पर आ गई कि उन्हें पटरीयों पे हॉर्न बजाती हुई मालगाड़ी भी जगा ना सकी. और पटरियों पे सोये हुए त्रिलोकी के मजदूर साथिओं को कुचलते हुए, वे मालगाड़ी आगे बढ़ गई.
वे तो त्रिलोकी की किस्मत अच्छी थी, कि वे अचानक लघुशंका को चला गया और जब लौटकर उसने अपने साथियों का हाल देखा तो, त्रिलोकी आवाक़ सा कभी साथियों की कटी तड़पती लाशें, ख़ून से सनी बिखरी रोटीआं व उस मालगाड़ी को देख रहा था, जो अपने पीछे उसके मजदूर साथिओं की उन खुली और पथराई आँखों में अपने घर कभी न पहुंच पाने का सन्नाटा व दर्द छोड़े जा रही थी.
यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758
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