मै रोज चढ़ता हूं,
इस महानगर में देने,
इंटरव्यू की सीढ़िया.
पर मेरे हार की सलीब पे,
लटक जाती है,
मेरी डिग्रियां.
ये बेरोजगारी का भयावहपन,
और घुटन,
वही इंटरव्यू
और मेरे हताश लौटते कदमो पे,
कहकहे लगाती----
महानगर के दफ्तरों की सीढ़िया.
नौकरी के लिए---
फुटपाथ-फुटपाथ राते काटी,
खाया कभी नही खाया,
बस अखबार में कलम से,
कहां-कहां जाना है,
निशान लगा अल-सुबह चल पड़ता,
चढ़ने और उतरने---
मैं दफ्तर की सीढ़ियां.
हमेशा की तरह सुनने नो,
एक दिन हार गया,
और भीतर से टुट गया,
तड़पाने लगी माँ की खांसी,
छोड़ दिया मैंने दफ्तर-दफ्तर जाना,
चलाने लगा रिक्शा,
आज महीनो हो गये मैंने नही देखी,
क्या करता देखकर,
जब मुझसे कही ज्यादा ऐ "रंग"
असहाय और बेरोजगार थी--
मेरी डिग्रियां.
यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758
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