व्यंग्य-----(मै खूबसूरत व स्मार्ट हूँ )
"मैं जन्म से ही वेस्टइंडीज के बच्चों और नागरिकों से ज्यादा खूबसूरत व स्मार्ट हूं". बचपन में तो कॉलोनी की कुछ एक चालाक माँये अपने रोते हुए बच्चे के सामने जब मेरा नाम ले लेती थी तो उनके रोते हुए बच्चो पे मेरे नाम का इतना--"काला जादू की तरह असर होता कि वे सक- पकाकर ना केवल चुप हो जाते थे अपितु यू थरथरा कर कांपने लगते थे जैसे किसी कमजोर दिल के आदमी ने राम से ब्रदर कि कोई बहुत ही डरावनी फिल्म देख ली हो".
इसी तरह की एक घटना से मेरी पत्नी भी दो-चार हुई थी जिसको याद करके आज भी मेरी पत्नी को--"हल्का-फुल्का फीवर आ जाता है और उसे एक आध गोली कॉलपाल की खानी पड़ती है". वह घटना हमारी और उसके सुहागरात की है. क्योंकि वे पूरी शादी में अपनी एक लंबा सा घूंघट काढ़े हुई थी इसलिए उस समय वे मेरी सोहनी-सूरत देख नहीं पाई थी और यह अच्छा ही था अगर वह मुझे शादी के वक्त ही देख लेती तो शायद--"शादी के मंडप में ही वे गश खाकर गिर जाती और मेरी सुंदरता इतनी मशहूर हो जाती कि उस गांव व शहर की जवान लड़कियां अपनी सखियों की शादी से पहले एक बार जरूर चुहलबाजी के चटखारे लेकर मेरा लजीज मजाक उड़ाती".
सुहागरात के दिन जब मेरी पत्नी ने मेरा यह रूप और लावण्य देखा तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे वे अपने पति को नहीं बल्कि--"अपने अरमानों के नेपाल का भयंकर भूकंप देख रही हो". फिर खुद को किसी तरह उसने संयत किया और अपने कापते हाथों से उसने माचिस व मोमबत्ती पकड़ी जिसे सही से पकड़ने और जलाने में उसे 15 मिनट लग गए. जब मैंने उससे पूछा तो उसने कहा कि मुझे आपको पूरी जिंदगी देखना है अंधेरे में देखने से अच्छा है की आपको उजाले में देखकर मैं अपनी--"सांसो के ब्लड प्रेशर को अभी से दुरुस्त कर लूं".
यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P )
Mo. no. 7800824758
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