Wednesday, 15 July 2020

कविता---(फिर घिरे आज बादल )

(फिर घिरे आज बादल)
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
है तेरी हुस्न के ये बादल भी मारे,
ये जाना सनम--------------
जब तुम्हे चुमने की हसरत लिये,
आपस मे ही खुद भिड़े आज बादल।
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
मांगा सभी ने पानी मगर,
ना सुनी बादलो ने-------
किसी की दुआ!
वे तो तुम थी हमारे शहर में सनम,
जो बूँद बनकर ज़मी पे गिरे आज बादल।
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।

###हमारे शहर में आज लगातार बादल घेरे हुये है अब बरसात कितनी होती है ये बात की बात है।

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