Wednesday, 22 July 2020

कविता---(सखी हे रे बदरवा )

तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा,
करे छेड़खानी सखी छेड़े बदरवा।

सिहर-सिहर जाऊँ शरमाऊँ इत-उत,
मोहे पिया की तरह सखी घेरे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

चुम्बन पे चुम्बन की है झड़ी,
बुँद-बुँद चुम्बन सखी ले रे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

अँखियो को खोलु अँखियो को मुँदू,
जैसे मेरी अँखियो में कुछ सखी हे रे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

मेरी यौवन का आँचल छत पे गिरा,
मेरी रुप का पढ़े मेघदुतम सखी हे रे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

###हिन्दी प्रतिलिपि में इस रचना को प्रकाशित 
करने के लिये मै विणा वत्सल सिंह जी का तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ।

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