(मेरी कविता की बुढ़िया)
मेरी कविता की बुढ़िया उदास है,
विदेश मे रहते है इसके बेटे और बहु,
इसका पुरा मकान खाली है।
वे देखो आँगन और सुखी तुलसी,
और किनारे खड़ी----------------
बिल्कुल बुढ़िया के दिल की तरह,
टुटी चारपाई,
जिसपे वे ठंड के दिनो मे,
गुनगुनी धूप मे सरसो के तेल की,
घंटो बेटे की किया करती थी मालिश,
आज उसी तेल की कटोरी में,
उसके वात्सल्य का अरमान खाली है।
वे देख रही है एकटक------------
दिवाल पे टंगी अपने बेटे के बापु की,
वे धूल भरी फोटो!
फिर बुदबुदा के लौटती है बीना रोये,
जैसे पढ़ लेगे फोटो से ही,उसके बापु
उसका दर्द उसकी पिड़ा!
आँखो में उसके अब तुफान खाली है।
अभी पिछले ही दिनो,
मेरी कविता की ये बुढ़िया बिमार हुई है,
अब न बचेगी!
इसकी हिचकियाँ और बार-बार
दरवाजे की तरफ तकना,
वही हुआ बुढ़िया मर गई,
मेरी कविता तो पुरी हो गई,
पर उसके विदेशी बेटे और बहु नही आये,
जहाज़े आती और जाती रही,
एै,रंग------फिर भी हर ऐयरपोर्ट पे,
मेरी कविता की बुढ़िया उदास खड़ी है।
###मेैने ये रचना कमेंट और टिप्पणी के लिये नही लिखी है इसे कमही लोग पढ़े पर पुरी रचना पढ़े इसका लास्ट इस रचना का प्राण है ये बिदेश मे रह रहे उन तमाम बेटे और बहुओ के ऐहसास के उस मौत से है,जहाँ पर मेरी कविता की ये बुढ़िया अर्थात एक माँ का वात्सल्य दरवाजे पे मुँदती हुई अपनी आँखो से एक मर्तबा बस बेटे को देख भर पाने का मोह लिये दुनिया छोड़ देती है,ये मेरे लेखन की एक सदा है या मालिक ये सदा
गर इस तरह के एक बेटे के कान तलक भी गई तो मै समझुगा की ये मेरी इस रचना की पुर्णता हुई।
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