Tuesday, 6 October 2020

व्यंग्य----(हाय रे ! प्याज़ )

व्यंग्य------(हाय रे !प्याज ) 

 

अभी तलक बरसात में नदियां हैं खतरे के निशान से ऊपर बह रही थीलेकिन इस समय--प्याज की महंगाई भी अपने खतरे के निशान से ऊपर है. " पत्नी का शेयर बाजार की तरह गिरे हुए मुंह को देखकर तरस आ रहापर क्या करूंमैं भी अपने जेब की संवैधानिक व्यवस्था से मजबूर हूं, " आज किचन की यह श्रृंगारीक हालत हैकि वहां भी पिछले दिन से रखा प्याज नकचढ़ी साली की तरह सब्जी वाली टोकरी में ऐंठ रही है. "

 

प्याज की महंगाई ने मुझ जैसे व्यंग्य लेखक को भी कंफ्यूजावस्था में पहुंचा दिया है. समझ नहीं पा रहा हूं कि मैं--प्याज को स्त्रीलिंग लिखूं या पुलिंगकभी यह प्याज--पत्नी की तरह थी आज इसके सारे हाव-भाव किसी प्रेमिका की तरह लग रहे". प्याज के चलते इस समय सब्जी मंडी के बाहर ठेले लगाने वाले भी अपने ग्राहकों से ऐसे बातें कर रहे जैसे वे कोई--"सब्जी विक्रेता नहीं बल्कि वे इस पूरे इलाके के शहर कोतवाल हो.ग्राहक भी अगर प्याज खरीदने के लिए उसके ठेले के पास रुकता है तो प्याज को वे इस डर से छूकर उसके दाम नहीं पूछता कि कहीं यह-- "ठेलेवाला कोतवाल इसे किसी चोर उचक्के  या जेबकतरे की तरह डाट ना दे."

 

 

पहले मैं जो सब्जी 20 मिनट में खरीद कर खाली हो जाता थाअब वही सब्जी खरीदने में मुझे घंटों लग जाते हैं. यह सारी महिमा प्याज के बढ़े हुए भाव की वजह से है. मेरे सब्जी खरीदने की यह--"ओलंपिक शुरुआत पहले ठेले से शुरू होकर आखरी ठेले पर जाकर खत्म होती है.

 

पहले सब्जी लेने जाता था तोपत्नी यूं ही बेमन से सब्जी वाले झोले को पकड़ा देती थी और साथ ही दो-एक कड़ी बातें मुझे अलग से सुना देती थी. लेकिन  इस प्याज के बढ़े हुए दाम ने उसका पूरा बॉडी लैंग्वेज ही बदल दिया है. वे तीन-चार दिन से मुझे बहुत ही प्यार से सब्जी के झोले को पकड़ा रही और मेरे सब्जी लेकर लौट आने तलक बड़ी ही बेसब्री के साथ वे  दरवाजे पर खड़ी रहती है. 

 

ऐसे बेसब्री के साथ मेरा इंतजार वे तब किया करती थी जब उसकी और हमारी नई-नई शादी हुई थी. यह सब परिवर्तन इस प्याज की वजह से हुआ है. मैं अब  जब भी बाजार से सब्जी लेकर लौटता हूं. तो वह मेंरे हाथ से बहुत ही प्यार से सब्जी वाले झोले को पकड़ लेती है. लेकिन जैसे ही मैं उसे प्याज ना खरीद पाने की वजह बताता हूं तो उसका सारा उत्साह पल भर में ही गायब हो जाता है फिर वे किचन की तरफ बड़े ही उदास मन से सब्जी रखने चली जाती है.

 

अब तो मुझे और मेंरे व्यंग्य लेख दोनों को ही--इस प्याज के बढ़े हुए दाम का खतरे के निशान से नीचे आने का बड़ी बेसब्री से इंतजार है.क्योंकि प्याज की महंगाई की वजह से मुझे अब अपनी पत्नी का लटका हुआ मुंहबहुत कष्ट दे रहा. काश! की सरकार जल्दी प्याज के दाम या महंगाई को कंट्रोल करेंजिससे मेरी पत्नी के खूबसूरत चेहरे का लालित्य वापस लौटे और हम भी इस कहने या लिखने से बरी हो सके कि--"हाय रे ! प्याज."

 

 

यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 

जज कॉलोनीमियांपुर 

जिला--जौनपुर pin.no.222002

Mo.no.7800824758

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