"सारे सरकारी विभाग या महकमें का सौंदर्य वर्णन काफी बदमजा और असाहित्यिक है". बिना पुलिस विभाग के सौंदर्य वर्णन का जिक्र किए--हमारी व्यंग्य विधा के सारे सुकुमार व खूबसूरत शब्द रूपी व्याकरण के यह--"पुलिस महकमें के लोग शाहनाज के ब्यूटी प्रोडक्ट हैं". इनमें व्यंग्य अलंकार को चार चांद लगाने वाली गालियों के छंद या अतुकांत कविता या साहित्य पद्य व्यंग्य के यह--"मॉडर्न हरिशंकर परसाई हैं". इनके स्तर का साहित्य आप हर थाने पर 2 या 4 पा जाएंगे--"जिसका पाठन यह अपनी सुविधानुसार गालियों से करते हैं".
इनके होठों पर हंसने की संभावना काफी कम पाई जाती है--"यह हंसते भी हैं तो लगता है कि जैसे 5 या 6 महीने बाद हंसे हो, इनके होठ भी इनके हंसने में अपना प्राकृतिक साथ नहीं दे पाते". यह जबरदस्ती अपना दांत चीआरे से लगते हैं और इनका पेट तो माशा अल्लाह इनकी इस सुंदरता में और भी चार चांद लगा बैठता है जिस थाने के आसपस किसी ने कभी भी पेट से हुई महिला का पेट ना देखा हो तो-- "इनके पेट को देख ले तो उसकी यह राष्ट्रीय हसरत भी पूरी हो जाएगी".
पुलिस महकमें की पेट को देख आप यूं ही समझ जाएंगे की पैदा होने और चलने से पहले क्या हमारे देश की यह महान विभूति जमीन पर दौड़े भी थे. "पैसा और दलाली इनके स्वास्थ्य के लिए प्रोटीन का काम करता है ".पुलिस महकमा अन्य सरकारी महकमे से कहीं ज्यादा खतरनाक व बंगाल के काले जादू की तरह है. "पुलिस वालों पर व्यंग्य लिखना, मारने वाले सांड को लाल कपड़ा दिखाने के समान है".अतः हम व्यंग्यकार भी इन पर कुछ लिखने से पहले अपनी कलम की--"बीपी और सादे कागज की शुगर को भली-भांति चेक कर लेते हैं, तब कहीं जाकर हम इनके सौंदर्य वर्णन पर थोड़ा बहुत रिस्क लेकर लिख पाते हैं".
यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.
दिनांक--27/3/2020
लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर pin.no. 222002 (U P )
Mo.no. 7800824758
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