लघुकथा----( जुम्मन की शहनाई)
जिस जुम्मन की मौत हुई थी वे कोई आम मौत नहीं बल्कि हमारे शहर के एक मशहूर शहनाई कलाकार की मौत थी. लगभग छ दशक तक जुम्मन मियां ने शायद ही कोई ऐसी शादी रही हो जिसमें उन्होंने अपनी शहनाई ना बजाई हो.
उस छ दशक में जितनी जरूरत एक युवा जोड़े को शादी की थी, उतनी ही जरूरत उस शादी में जुम्मन मियां के शहनाई की भी थी. इसलिए जुम्मन की मौत की खबर ने छह दशक की उन सभी शादियों की आंखें भी भीगो दी जिन शादियों में जुम्मन मियां ने अपनी शहनाई बजाई थी.
जुम्मन मियां का एक-एक अंदाज आने वाली कई पीढ़ियां याद रखेंगी, उनका वे विशेष टोन में हंसना व पान की गिलोरी को एक तरफ दबा कर बात करना सब खत्म हो गया. ऐसा नहीं कि अब शादियां नहीं होगी, होंगी लेकिन उन शादियों में जुम्मन मियां की शहनाई की वे धून नहीं गूजेंगी जिससे वे पूरी महफिल लूट लिया करते थे .
हमारे शहर के वे एकलौते ऐसे शख्स थे, जिन्हे शहर का कोई भी मोहल्ला कभी हिंदु या मुसलमान नही कहता था. उनके मौत की खबर सुन मैं और मेरी पत्नी दोनो ही फ़फ़क के रो पड़े.
क्योंकि जुम्मन मियां ने हम दोनो की टूट और बिगड़ रही शादी को एक पिता की तरह आगे बढ़कर बचाया था. हमारी शादी की वे घटना आज फिर से जीवित हो गई, जब भरी मंडप में चक्कर आने की वजह से मैं गिर गया था और होने वाली पत्नी के मुहल्ले के लोगो ,रिश्तेदारो ने मुझे व मेरे पुरे परिवार को बंधक बनाकर थाने से पुलिस बुला करके एफ आई आर कर दिया.
मेरी पत्नी के तरफ के लोगों ने पुलिस को बताया कि इस लड़के की शादी उसकी बीमारी को छिपाकर की जा रही है. जबकि सच्चाई ठीक इसके उलट थी मुझे अत्यधिक थकान के कारण यह चक्कर आया था, तब मैंने पहली बार जुम्मन मियां को अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ उस शहनाई की कसम खाते हुए सुना व देखा जो उन्होंने आज से पहले कभी भी किसी भी शादी में नहीं किया था.
उन्होंने अपने भरे कंठ से कहा साहब मैं पिछले कई पीढ़ियों से इस खानदान और परिवार की शादियों में ना केवल शहनाई बजाई है बल्कि इस परिवार के एक- एक सदस्य को मैं अपने घर की तरह जानता हूं, इस लड़के में कोई बीमारी नहीं है अगर आप सबको विश्वास ना हो तो आप मुझे अपने यहां महीनों बंधक बनाकर इस लड़के की डाक्टर से जाँच करा ले.
तब थाने के दरोगा ने कहां की जुम्मन की शहनाई अपने आप में खुद एक विश्वास व यकीन है, क्योंकि जुम्मन तो मर सकता है, लेकिन अपने शहनाई की झूठी कसम कभी नहीं खा सकता, और सच भी वही हुआ हमारी शादी फिर रुकी नहीं कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि जैसी शहनाई मेरी शादी के विदाई के वक्त जुम्मन मियां ने बजाई थी वैसी शहनाई शायद ही किसी शादी में उन्होंने बजाई हो.
अतः आज केवल जुम्मन की मौत ही नहीं हुई थी बल्कि हम पति-पत्नी के एक शहनाई बजाने वाले वालिद का भी इंतकाल हुआ था.
यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758
दिनांक-11/10/20 को राजस्थान पत्रिका के परिवार में प्रकाशित.
No comments:
Post a Comment