वैसे आप सभी माने या ना माने लेकिन मेरा यह मानना है कि चाहे जिस भी सरकारी महकमे के घुस खाने वाले मुलाजिम या व्यक्ति की तोंद निकली हो लेकिन उनमें सबसे खूबसूरत व स्मार्ट तोंद अगर देखने में लगती है तो यह पुलिस महकमें की लगती है.
वे जब अपनी घूस लेने की--"प्रदूषण युक्त मूछों के साथ हंसते हैं तो लगता है कि जैसे इन्होंने या इनके किसी खानदान ने अच्छाई का कोई भी सुंदरवन आज तलक नहीं देखा है जिसका साक्षात असर इन पर पड़ा है ".यह तोंद वाले पुलिसकर्मी मनुष्य नहीं बल्कि मनुष्य के रूप में जन्मे नागासाकी और हिरोशिमा के आणविक रेडिएशन है.
इनके वजन का--"भयंकर रसास्वादन कर रही थाने की कुर्सी भी ऐसे सांस छोड़ती है जैसे कि उसका दम घुट रहा हो". जब तोंदवाले यह साहब जरा सी अपनी तशरीफ़ उठाते हैं तो कुर्सी से आई आवाज अपने पंचर फेफड़े में थोड़ा सा ऑक्सीजन भर इनके पुनः तोंदग्रस्त वजन के साथ बैठने के लिए भर लेती है.
पुलिस वाले की तोंद किसी--"भू माफिया के जबरदस्ती कबजाए गये कई बीघे जमीन सी लगती है". कोई फरियादी रोए या गाये इससे इनका कोई मतलब नहीं बस इनके तोंद के सेवा रूपी गुल्लक या बैंक के खाते में कितना पैसा डाल सकता है इससे मतलब है.
सब्जी मंडी, फल मंडी, मीट मार्केट हर कहीं इनकी निकली हुई तोंद कि कुछ अपनी कहानियां या गुलछर्रे हैं, इस ठेले से उस ठेले जाना और उस बीच क्लासिकल तरीके से उनकी तोंद का हिलना यह साबित करता है कि यहां इनकी वर्दी व तोंद की निशुल्क पुलिसिया रंगदारी चलती है.
सच इच्छा होती है कि ऐसे तोंदवाले किसी योग्य पुलिसकर्मी कि तोंद को प्रति वर्ष मै अपनी व्यंग्य विधा के बाई नेम सर्वश्रेष्ठ वार्षिक तोंद के सम्मान पत्र से नवाजे व उनके खूबसूरत व स्मार्ट तोंद को हर उस घर में अनिवार्य रूप से टंगवाउ जो घूस रूपी सुंदरता के साथ अपनी-अपनी तोंद के वजन में पुलिसवाले की तरह श्रीवृद्धि कर रहे हैं.
यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758
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