स्त्री केवल देह या कामुकता नही बल्कि वे विश्व दर्शन है, वे अगर किसी पुरुष के द्वारा तिरोहित भी है तो उसके देवत्व का पवित्र आचमन भी है,स्त्री अगर नग्न भी होगी तब भी वे शिवानी के रथ्या की तरह समाज के कामुक धुंधलके से गुजरती हुई अपनी स्त्री देह को थकाकर अपने अंदर उस स्त्री को तलासेगी जो उसके अंतरतम में कही घुटती हुई अपने दोनो हाथो से स्तन को छिपाए अपने स्त्रीत्व के एक टुकड़े को भी बचाने का प्रयास करेगी लेकिन वे बचा नही पाएगी क्योंकि किसी भी स्त्री के स्तन पुरी दुनिया में सर्वाधिक रेप का सामना करती है.
ऐसे में अगर केनवास गूंगे हो गए तो फिर हमारी दुनिया से इस नग्नता की वे नैसर्गिक कलात्मकता मर जाएगी, वहा सिर्फ पशुता बची रह जाएगी,
मै आपकी इस कृति में दर्शाई गई यौनिक नग्नता को देवत्व के एक ठहराव की तरह देख रहा.
ये आपके उत्कृष्ट कला की "मत्स्यगंधा हैं जहा किसी भी पुरूष मन के,शांतनू की एक प्राकृतिक प्यास हैं जो जितना देखेगा उसकी प्यास इस कला के नदी तट पर और बढ़ती जाएगी ✍️✍️💐💐
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