Friday, 17 June 2022

(पतझड़ की तरह रोई)
बहुत खूबसूरत थी मै लेकिन--------
रोशनी में तन्हा घर की तरह रोई।
कोई ना पढ़ सका कभी मेरा दर्द------
मै लहरो में अपने ही,समंदर की तरह रोई।
सब ठहरते गये----------------
अपनी अपनी मील के पत्थर तलक,
मै पीछे छुटते गये सफर की तरह रोई।
लोग सावन में भीग रहे थे,
ऐै "रंग"----मै अकेली अभागन थी
जो सावन में पतझड़ की तरह रोई।

@ रंगनाथ द्विवेदी
# 7800824758

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