Wednesday, 20 July 2022

गज़ल--------(बरसने की जरुरत न पड़े)
या खुदा--------------
उसके रोने से धुल जाये मेरी लाश इतनी,
कि बदलियो को घिर-घिर के बरसने की जरुरत न पड़े।
वे तड़पे इतना जितना ना तड़पी थी मेरे जीते,
ताकि मेरी लाश पे किसी गैर के तड़पने की जरुरत न पड़े।
या खुदा----------
वे मेहंदी और चुड़ियो से इतनी रुठ जाये,
कि शहर मे उसको बन-सँवर के निकलने की जरुरत न पड़े।
एै हवा उड़ा ला उसके सीने से दुपट्टे को,
और ढक दे मेरी लाश को------------
ताकि मेरी लाश पे किसी गैर के कफ़न की जरुरत न पड़े।
या खुदा------------
वे जला के रखे एक चराग हर रात उस पत्थर पे,
जहाँ बैठते थे हम संग उसके,
ताकि एै"रंग"--------
मेरी रुह को भटकने की जरुरत न पड़े।
या खुदा---------
उसके रोने से धुल जाये मेरी लाश इतनी,
कि बदलियो को घिर-घिर के बरसने की जरुरत न पड़े।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

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