तमाम हादसों से दुखी था कैलेंडर
आँख मेरी भरी थी,
पर रोया था कैलेंडर.
सच तो ये है कि,
हमें तारीख बताने के लिए
ऐ "रंग"–
पूरे साल भगवान यीशु की तरह,
मेरे कमरे की कील में-
टंगा था कैलेंडर.
यह रचना मेरी स्वरचित है.
रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जौनपुर,(उत्तर-प्रदेश )
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