रात के अंधेरे में सोने आई थी
दलित बस्ती से
छूपके-छूपाके
लेकिन सुबह के धुंधलके में
उठी,
तो उसने अपने दुखते बदन को
थोड़ा सा,तोड़ा
फिर,पलंग के अगल बगल
बेतरतीब लटकी साड़ी
को उसने बिना पहने ही कुछ देर देखा
और सोचा
कि रात भर छुई हुई उसकी देह
इस कोठरी से
बाहर निकलते ही
दिन के उजाले में
दलित हो जाएगी
वे भी क्या करे
जिससे व्याही है
वे नीरा शराबी हैं
उसे शराब मिल जाए बस
क्या फर्क पड़ता है
कि उसकी ब्याहता
रात के अंधेरे में
छुप छुपा के कहा
और क्यों जाति हैं?
वह भी एक औरत थी
अपनी देह को
पति के देह से आत्मसात कर
उसके पौरुष की गंध को
अपने सांसों में महसूस करना चाहती थी
लेकिन
शराबी पति की वजह से
उसकी देह
रात में रानी
और दिन के उजाले में दलित हो गई .
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