Friday, 19 September 2025

ग़ालिब हूं

(अपने दौर का ग़ालिब हूं)

मैं चढ़ा नहीं कभी मस्जिद की सीढ़ियां
थी काफिर-ऐ-लत मुझे छक के पीने की,
गर सलीके से लिखूं
तो ऐ "रंग"
मैं अपने दौर का गालिब हूं.

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