Rangnath Dubey's Poems
Friday, 19 September 2025
ग़ालिब हूं
(अपने दौर का ग़ालिब हूं)
मैं चढ़ा नहीं कभी मस्जिद की सीढ़ियां
थी काफिर-ऐ-लत मुझे छक के पीने की,
गर सलीके से लिखूं
तो ऐ "रंग"
मैं अपने दौर का गालिब हूं.
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment