Sunday, 7 December 2025

दिसंबर लिखता हूं

(दिसंबर लिखता हूं)

तुम्हें---
धुंधली और गुनगुनी,,,
धूप का,अंबर लिखता हूं.
तुम्हे--
अपनी गीतो में 
मैं,,दिसंबर लिखता हूं.

अब भी तुम 
वैसे ही आती हो
छत पे
अपने गीले बालों को सुखाने

तुम्हारे होंठो पे 
पानी की,बूंदों के चंद कतरे 
जो तेरी इन
गीले बालो से होके 
तेरी इन खूबसूरत
होंठो पे गिरे हैं 
यूं लगे रहे हैं कि,,जैसे 
ओस से भीगे हो, 
तुम्हारी होंठो के ये 
 "गुलाब" सारी रात

उसपे ये ,ठंड की हवा 
जब चूमती है तेरा बदन 
और 
तुम सिहर उठती हो
तो जी करता हैं
कि मैं चला आऊं 
तेरी छत पे 
और हौले से थाम लूं
तुम्हारी वे कलाई
जिस कलाई को तेरे
मैं अपनी गीतों में
दिसंबर लिखता हूं.
 
मेरे गीतों की जब किताब 
पूरी होगी 
तो उसकी कवर पे
तुम ऐसे ही छपोगी
ताकि
ये शहर जान ले 
कि तू वही लड़की हैं 
जिसे मैं अपनी गीतों में 
दिसंबर लिखता हूं.

"क्या आप भी किसी को दिसंबर लिखते हैं अगर नही लिखते हैं तो लिखिए"

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर--222002 (U P)

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