Wednesday, 9 June 2021

47वर्षो से अनवरत प्रकाशित देश की सबसे पुरानी और चर्चित मासिक पत्रिकाओं में से एक "नूतन कहानियाँ " के मई 2021 के अंक में चौथे (4) नंबर पर मेरी कहानी "रुदाली--एक घाव " प्रकाशित.कहानी---(रुदाली---एक घाव )

47वर्षो से अनवरत प्रकाशित देश की सबसे पुरानी और चर्चित मासिक पत्रिकाओं में से एक "नूतन कहानियाँ " के मई 2021 के अंक में चौथे (4) नंबर पर मेरी कहानी "रुदाली--एक घाव " प्रकाशित.

कहानी   (रुदाली----एक घाव )

 रुकमणी जब अपने मायके से ब्याह कर शादी के जोड़े में ससुराल आई थी, तो उसके सारे  कुंवारे  सपने बिल्कुल अन्य ब्याह कर आई लड़कियो व  दुल्हनों  की तरह कितने सुर्ख व गुलाबी थे.उसकी कल्पनाओं के पाँव में-"एक नारी सुलभ थीरकन थी" हर दो घंटे बाद खुद को कमरे के दर्पण में देखना और खुद को देख खुद शर्मा जाना ये नव-ब्याहता रुक्मणि की आदत में जैसे शुमार होता गया, और वे अपने पिया के ना आने तलक, कमरे के उसी दर्पण  से--ढ़ेर सारी अपनी व अपने मन की बाते किया करती थी. 

लेकिन कहते है कि--हर कैनवास को जरूरी नही की उसके मन का चाहा हुआ ही रंग मिले,  "अक्सर जिंदगी को बदमजा रंग भी मिलते है"  जैसा कि रुक्मणि के साथ हुआ. उसकी बेटी कहने वाली सासु माँ नकली किरदार को अपने यथार्थ से कब तलक अलग रखती एक दिन उसने अपनी उस नकली शास्त्रीयता का त्याग कर अपनी कड़वी व कसैली वाणी का प्रयोग जैसे ही किया वैसे ही जैसे आज रुक्मणि के  देखे गये-"सुर्ख व गुलाबी सपनो ने अपनी रंगत खो दी हो".जिस ननद की चुलबुली बाते सुनकर वे आनंद से भर उठती थी आज उसी ननद ने जैसे उसके वात्सल्य रूपी भाभी को अपने नाख़ून से गहरे घाव कर उनपे नमक और मिर्च का लेपन कर दिया हो. 

रुक्मणि को आज--अपने देवर की आँखों में भी एक कामुक और खुंखार सी चमक अपने युवा शरीर  को लेकर दिख रही थी. पहले रुक्मणि ने इसे अपना धोखा समझा--"लेकिन ये उसका धोखा नही बल्कि यथार्थ था".क्योंकि उसका देवर आज बार-बार किसी ना किसी बहाने से उसके घर का काम करते समय इधर-उधर फ़िसल जा रहे या गिर जा रहे आँचल पर ही जैसे लगी हुई सी थी, आज वे अपने देवर की उन आँखों से बचने के लिए जल्द से जल्द सारा काम निपटाकर ज़ब अपने कमरे में आई तो कमरे को उसने भीतर से बंद कर--"कई गहरी-गहरी सांसे ली उसे यूँ लगा की उसने जिंदगी में कभी इतनी गहरी और थकी सांसे नही ली थी जैसी की रुक्मणि ने आज ली है". 

आज रुक्मणि को अपनी संजोई दुनिया या उसके देखे सारे सुन्दर सपने सब जैसे बिखरे व खत्म होते दिख रहे थे. उसे आज अपने कमरे का वे दर्पण भी अपना नही लग रहा था  जिस दर्पण से वे कभी घंटो नजरें नही फेरा करती  थी आज उसने उसी दर्पण से अपने आप को एक झटके के साथ हटा लिया. आज रुक्मणि को अपने कमरे की सुहागन बिस्तर का बेवापन कचोट रहा था,जिस बिस्तर पे कभी उसके पति के प्यार की सीलवट व चुंबन थी आज उसी बिस्तर पर रुक्मणि अपनी करवट बदलकर नागफनी की चुभन जी रही. 

ऐसा हो भी क्यों ना आखिर घुटन और मन की चीड़-चिड़ाहट का एक दिन यही अंजाम होना था, जैसा की रुक्मणि के साथ हुआ एक रात उसके पति और उसके बीच ऐसी तू तू, मैं मैं हुई जिसने एक सीधी-साधी सी रुक्मणि को वे घाव दिये जिसकी टीस व पीड़ा ने उसका सबकुछ छीन लिया, वे फिर भी सबकुछ सहन करती रही महज अपने पति के एक कतरे प्यार के लिये. लेकिन रुक्मणि ये नही जानती थी कि उसके पति का सबंध विवाह से पूर्व भी अन्य औरतों से भी था. उस दिन उसके पति ने उसे उस बिस्तर पर इतनी बेरहमी से अपने चमड़े की बेल्ट से पिटा व मारा जिस बिस्तर पर कभी उसके प्यार को इस रुक्मणि ने जिया था. आज रुक्मणि का वे पुरा बिस्तर सिसक रहा उसके जिस्म के घाव तो भर जायेंगे लेकिन वे घाव कैसे भरेंगे जिस घाव ने रुक्मणि से इसे अब हमेशा के लिये ना भरने वाले अंतर्मन के घावो की रुदाली बना दिया.

लेकिन नही उस दिन जब रुक्मणी की आँख सुबह के धुंधलके मे खुली तो ये वे रुक्मणी नहीं नही थी, बल्कि ये एक नई रुक्मणी थी जिसने अपने बदन के उन चोट के निशान को एक बार देखा और फिर उसे छुवा, छुने के बाद वे उठी और अपनी समस्त दैनिक दिनचर्या से निवृत हो. अपने सभी आवश्यक सामान को एक अटैची मे रख कर उस कमरें की चाभी अपनी सास को पकड़ाते हुए कहा कि एक बार इस अटैची को देख लीजिए की कही मैं इस अटैची मे आपके घर का कोई किमती सामान तो नही लेते जा रही, तभी उसकी सास पहले की तरह कर्कश आवाज़ मे बोली तुम्हारी यह हिम्मत कि तुम घर छोड़कर जा रही हों, इतना सुनते ही घर के सभी सदस्य वहां आ गए और रुक्मणी के हाथ से उसकी अटैची छोड़ने के लिए आगे बढ़े तो रुक्मणी बोल उठी, खबरदार अगर किसी ने मेंरे हाथ से इस अटैची को छोड़ने की कोशिश की तो.

क्योंकि अब तलक तुम सभी लोग जिस रुक्मणी से उसका सुख-चैन छीनते रहे हों वे रुक्मणी और थी और आज जो तुम लोगों के सामने खड़ी है ये रुक्मणी और है, इतना सुनते हीं सभी सहम गए किसी कि हिम्मत नही हुई कि वे रुक्मणी के हाथ से उसकी अटैची छिन ले, फिर रुक्मणी एक छण भी उस घर मे रुकी नही, वहां से निकलने के बाद रुक्मणी ने ऑटो कर, ऑटो वाले से कहा  भैया मुझे स्टेशन छोड़ दो, ऑटो वाले ने रुक्मणी को स्टेशन पर उतारा तो रुक्मणी ने ऑटो वाले का किराया देकर अपने सामान सहित स्टेशन के अंदर गई, फिर थोड़ी देर बाद वे टिकट खिड़की के पास जाकर बोली जी एक लुधियाना की टिकट दे दीजिए, टिकट लेने के बाद रुक्मणी ने पुछा यह बताइये कि लुधियाना वाली ट्रेन कब तलक आएगी, तो उसने कहा आज अपने निर्धारित समय से एक घंटे लेट आएगी.

फिर रुक्मणी वही प्लेटफार्म के पास खाली बेंच पर बैठी और ना चाहते हुए भी वे अपने बीते हुए कल के ख़्यालो मे खो गई, उसे होश तो तब आया जब उसे किसी औरत ने जोर से झिझोड़ा और इस झिझोड़ने के तुरंत बाद ही जब रुक्मणी ने उस औरत को देखा तो आवाक रह गई क्योंकि जो औरत उसे झिझोड़ रही थी वे कोई और नही बल्कि उसके बचपन कि बहुत ही प्यारी सहेली पुष्पा थी, जो उसे रुक्मणी, रुक्मणी कहकर झिझोड़ रही थी, जब रुक्मणी थोड़ी सामान्य हुई तो उसने पुछा, अरे! मेरी रुक्मणी किन ख़्यालो मे खोई हुई थी, जरा मैं भी तो जानू? इतना सुनने के बाद बरबस रुक्मणी की आँख भर आई और वह ना चाहते हुए भी, पुष्पा के कंधे से लग सिसक पड़ी, कुछ देर पुष्पा ने रुक्मणी को सिसक लेने दिया.

फिर जब लगा कि रुक्मणी अब थोड़ी ठीक है तो उसने पुछा रुक्मणी ये मैं क्या देख रही हूं, तु तो ऐसी ना थी फिर ऐसा क्या हुआ कि तु इतनी कमजोर हों गई, फिर रुक्मणी ने एक-एक कर अपने सारे दर्द को पुष्पा से बताती चली गई, बताने के बाद रुक्मणी ने कहा पुष्पा अब मैं एक नए फैसले के साथ एक बार फिर से मैं नया जीवन जीना चाहती हूं, लेकिन रुक्मणी आखिरी  तु जाएगी कहा! तो रुक्मणी ने कहा अब जहा मुझे मेरी किस्मत लें जाए. तो पुष्पा ने कहा रुक्मणी तुम्हें याद है तु कॉलेज के जमाने मे कितना बेहतरीन और लाजवाब लिखा करती थी, इतना ही नही बल्कि तुमने पुरे कॉलेज मे एम काम टाप भी किया था, तु एक काम कर,अभी-अभी मेंरे चाचाजी की कंपनी मे अकाउंटेंट का एक पद खाली हुआ है, मैं अपने चाचा से कह दुंगी तो वे तुम्हें आसानी से अपनी कंपनी मे रख लेंगे और इतना ही नही मैं तुम्हें कोई अच्छा सा फ्लैट भी किराए पर अपने आस-पास कही दिला दुंगी.

फिर पुष्पा कि मद्त से रुक्मणी ने अपने एक अलग और नए जीवन कि शुरुआत की, इस बीच उसने इतनी मेहनत और ईमानदारी से काम किया कि वे कंपनी तीन वर्षो से लगातार अपनी अच्छी गुणवत्ता के लिए पुरस्कृत हुई, इसी बीच काम से खाली होनें के बाद रुक्मणी ने उपन्यास "रुदाली " लिखना प्रारम्भ किया और रुक्मणी का यह उपन्यास लिखने मे उसे दो वर्ष लगा, जब उपन्यास पुरा हों गया तो उसे रुक्मणी ने देश के सबसे चर्चित पॉकेट बुक्स से प्रकाशित कराया. प्रकाशित होनें के बाद जैसे पुरे देश मे इस उपन्यास को खरीदने और पढ़ने कि होड़ लग गई,अतः  "रुदाली " उपन्यास मात्र आठ महिने मे सात बार रिप्रिंट एडिशन आई जो कि उपन्यास कि दुनिया मे एक रिकार्ड था.

फिर एक सुबह रुक्मणी ने जब अखबार के पहले पृष्ठ पर यह समाचार मोटे-मोटे अक्षरों में पढ़ा कि "रुदाली " उपन्यास के लिए रुकमणी को, भारत सरकार ने 15 अगस्त को 500000 / रुपए के साथ प्रशस्ति पत्र देने की घोषणा की. रुक्मणी 15 अगस्त के दिन फ्लाइट से दिल्ली जाने के लिए तैयार होकर घर से निकली, उसे फ्लाइट की टिकट अग्रिम भेजी गई थी. रुकमणी दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरकर अपना सारा सामान लेकर बाहर आई तो उसने एक टैक्सी को हाथ दिया तो टैक्सी उसके पास आ कर  रुक गई, उसने जब टैक्सी ड्राइवर से टैक्सी में अपना सामान रखने के लिए कहा तो,उस टैक्सी ड्राइवर ने रुक्मणी का सामान उठाने के लिए जब अपना हाथ बढ़ाया तो जैसे रुक्मणी को एक शॉक सा लगा क्योंकि वह टैक्सी ड्राइवर कोई अन्य नहीं बल्कि रुक्मणी का वही पति था जिसने रुकमणी को ना सिर्फ चमड़े की बेल्ट से मारा था, बल्कि उसने एक स्त्री की संवेदना की हत्या भी की थी.

रुकमणी बिना कुछ बोले चुपचाप टैक्सी में बैठ गई और उसे जहां जाना था उसने वह कार्ड, अपने पूर्व पति यानी की वर्तमान टैक्सी ड्राइवर को दे  दिया, तो रुकमणी की नजर टैक्सी में रखे हुए अपने उपन्यास  "रुदाली " पर पड़ी, आधा रास्ता तय होने के बाद किसी तरह हिम्मत करके उसके पति यानी कि टैक्सी ड्राइवर ने उससे कहा कि रुक्मणी तुम्हें ढेर सारी बधाई इस उपलब्धि के लिए, रुक्मणी ने भी जैसे रूटीन की तरह अन्य को धन्यवाद या थैंक्स  कहती थी वैसे ही उसने टैक्सी ड्राइवर को भी कहा.

कुछ देर के बाद उसने कहा कि रुक्मणी क्या तुम मुझे एक बार माफ नहीं कर सकती, तो रुकमणी ने कुछ देर बाद कहा कि माफ करिए मैं आपको नहीं पहचानती, क्योंकि जो रुकमणी कभी आपको पहचानती थी वे रुकमणी कोई और थी आज जो रुकमणी आपके सामने है, वह रुकमणी कोई और नहीं बल्कि अपने लिखें उपन्यास की " रुदाली" है . फिर रुकमणी अपने गंतव्य तक  पहुंचने के बाद उसे उसका किराया दे अपने होटल के कमरे की तरफ चल पड़ी, रुकमणी को यह भली प्रकार पता था कि उसका पति उसे अभी भी वही खड़ा एकटक देख रहा है, लेकिन रुकमणी अब उसे दोबारा नहीं देखना चाहती थी, इसलिए वे बीना मुडे अपने होटल के कमरें मे चुपचाप चली गई.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin.no.222002 (U P)
मोबाइल नंबर--7800824758

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