(इश्क़ करके)
ना पढ़ सकी कोई किताब,
मै इश्क़ करके.
मै औरत सुफि हो गई
इश्क़ करके.
मौलाना और तकरीरे मस्जिद,
तुम्हे मुबारक!
मै खुद हो गई----
मुकम्मल मुसलमान
इश्क़ करके.
ये हिज़ाब,ये परदे,ये चारदीवारी
कैद है औरत की,
तुम क्या निकालोगे इस कैद से मुझको,
मै खुद ही छोड़े जा रही,
अपने जिस्म का मकान,
ऐ,रंग-
इश्क़ करके.
रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश ).
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