शमीम रहती थी
कभी सामने नीम के———
एक घर था,
जिसमें मेंरी शमीम रहती थी।
वे महज़———
एक खूबसुरत लड़की नही,
मेंरी चाहत थी।
बढ़ते-बढ़ते ये मुहल्ला हो गया,
फिर काॅलोनी बन गई,
हाय!री कंक्रिट——–
तेरी खातिर नीम कटा,
वे घर ढ़हा——–
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।
अब तो बीमार सा बस,
डब-डबाई आँखो से तकने की खातिर,
यहाँ आता हूँ!
शुकून मिल जाता है इतने से भी,
ऐ,रंग———–
कि यहाँ कभी,
मेरे दिल की हकिम रहती थी!
कभी सामने नीम के——–
एक घर था,
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।
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