Sunday, 24 April 2022

बेटियो और बच्चियो के हर रोज हो रहे बलात्कार पे लिखी रचना.
                         (भयावह जंगल)
शहर की भीड़ मे भी हमने देखा है---------
कुछ आदमियो के अंदर का भयावह जंगल.
मासुम सा सीधा-साधा सा दिखने वाला-----
किसी बच्ची का अकेले मे जब रेप करता है,
और होठो पे कुत्सित हँसी दिखती है तो लगता है,
कि एक कमजोर सी चिड़ियाँ,तड़पेगी,चिचिआयेगी,
रहम की भीख मांगेगी,
मगर फिर भी निगल जायेगा उसे------------
इस शहर के कुछ आदमियो के अंदर का भयावह जंगल.
उसके पंख तितर-बितर हो जायेगे,
सबकुछ हा सबकुछ छिन लेगा,
चिड़ियाँ डरेगी,कापेगी,थरथरायेगी---------
फिर भी मजबुरी है जीना उसे भी ये भयावह जंगल.
उसकी डरी-सहमी खुली आँखो मे ये सवाल,
निरूत्तर सा रहेगा कि आखिर चिड़ियाँ,
किस नीड़,किस डाल,किस छाह जाये,
इस डर से वे रोज मरेगी,
बहुत घुटन है इस भीड़ मे,
बिटिया और चिड़ियाँ अब एक सी ही है,
न जाने दोनो को कब निगल जाये,
शहर के बाहर-----------------
और शहर के अंदर का भयावह जंगल.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियाँपुर
जौनपुर-----222002  (उत्तर-प्रदेश).
no.no.----7800824758

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