1-----ठाकुर का कुँआ
गर अंबेड़कर न होते-------
तो चढ़ नही पाते तुम मंदिर की सिढ़ियाँ,,,,,,,
पीने नही देता तुम्हे पानी,ऐ-रंग------
आज भी ठाकुर का कुँआ।
2----बुधुवा की लुगाई
दलित को ऐहसास अपनी ईज्ज़त का हुआ,
अब चीखती नही किसी भी कोठरी से----
ऐ-रंग----बुधुवा की लुगाई।
अंबेड़कर जयंती पर विशेष।
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