Wednesday, 6 April 2022

(शाम आवारा भटकना चाहता हूँ)
देवताओ से उबन होने लगी है---------
मै कुछ शाम आवारा भटकना चाहता हूँ।
हर एक के ख्व़ाहिश के फूल की तरह,
मै किसी मंदिर-मस्जिद या कब्र पे चढू----
ये गवारा नही,
हाँ मै किसी तवायफ़ के गजरे से लग-----
एक रात ही सही महकना चाहता हूँ।
ये दावते रईशी के निवाले बहुत हुये,
मै किसी फुटपाथ पे-------------
उस हरामी बच्चे की तरह,
अखबार पे सुखी रोटियां रख,
मै भी शहर के नाले की बजबजाती बू के पास,
उस सरकारी नल के पानी से----------
कुछ कौर निगलना चाहता हूँ।
देवताओ से उबन होने लगी है"रंग"-------
मै कुछ शाम आवारा भटकना चाहता हूँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

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