(कंगन उदास है)
विरह की सेज है,सिलवट है
करवट उदास है-------------
कि चले आओ परदेश से--कंगन उदास है।
जब से तुम गये हो न सजी-सँवरी,
यहाँ तलक कि-----------
कमरे का दर्पन उदास है।
कि चले आओ परदेश से--कंगन उदास है।
पाँव से निकाल करके रख दिया,
आपके पसंद की वे घुँघरू वाली पायल,
मै फिर पहन के थिरकुँगी आपके हाथो,
अभी तो उस पायल की छन-छन उदास है।
कि चले आओ परदेश से कंगन उदास है।
@@ Rangnath dubey
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