(मेरे जुड़े मे गुलाब)
मै आज भी----
आपके उस पहली छुवन सी,
सिहर उठती हूं!
जब आप टांकते हो मेरे जुड़े मे गुलाब.
उस समय आपको
शायद मेरी इस खुशनसीबी का अंदाज़ा,
ना होता हो,
पर मै अपनी शर्मिली आँख मुँदे,
जुड़े मे टांकते हुए गुलाब की
तरह मै,
आपकी अंगुलियों के स्पर्श को
अपने पुरे बदन पे महसुस करती हूं!
ये रोमानियत ही----
हमारे और आपके प्यार के बीच,
कि वे घूँघट है,
जिसे मै आधे निकले हुये चाँद की तरह,
अपने चेहरे पे डाले रखना चाहती हूं,
और नहाना चाहती हू--
आपके मेरे जुड़े में टांके हुये,
इस गुलाब की तरह हर मौसम,
कि उस गुलाबी बूँद से,
जिससे निखर के खिलती है ये गुलाब--
और इस गुलाब की एक-एक पंखुड़ी।
बस यही इच्छा है कि----
मुझे एैसे ही चाहना ता-उम्र,
और एैसे ही टांकना
आप मेरे जुड़े में गुलाब.
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर-222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no-7800824758
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