मुझे बरगलाओ मत
मैं बौद्ध हिंदू हूं,
बनारस हूं, प्रयाग हूं,
मैं इस घाट की बिटिया
उस घाट की बहू हूं.
हां,मै बौद्ध हिंदू हूं.
मैं सफर हूं, संघर्ष हूं,
मै हिलोरे लूंगी
बहुंगी दूर तक,
तुम महज घाट हो
सनातन के, पिघलोगे एक दिन
मुझे यकीन है
क्योंकि तुम केवल व्यक्ति हो
और मै,
सिन्धु हूं, नदी हूं,
हां! मैं बौद्ध हिंदू हूं.
दुत्कार, दुलार सभी अपने हैं
सह लूंगी
स्त्री हूं,वात्सल्य हूं,
लेकिन मुझे
यह कहकर बरगलाओ मत
कि, मैं अछूत हूं, दलित हूं
हां! मैं बिना तुम्हारे बताए ही
यह जानती हूं
कि, मैं दलित हूं
लेकिन,
मै तुम्हारे कहे धर्म क्यों बदलूं
मुझे गर्व है
कि, मै इस देश की अंबेडकर हूं,
बौद्ध हिंदू हूं,
मुझे लड़ना आता है
मैं अशिक्षा के अंधेरे में
पली बढ़ी नही
मै तोड़ना जानती हूं
जाति और उसकी बेड़ियां
मैं आज के शिक्षा की
ज्योतिबा फुले हूं
हां! मैं बौद्ध हिंदू हूं.
यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.
रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com
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