Saturday, 13 March 2021

कविता--(नेताओं का घर )

(नेताओ का घर)
मुझे नेताओ का घर---------
अब चकलेवालियो के घर से ज्यादा,
नापाक लगने लगा है।
कोई चरित्र नही इनके बिकने और गिरने का,
मुखौटे-दर-मुखौटे लपेटे,
मुझे नेता अपने जिस्मानी गलिज़गी का,
किसी चकलेवालि के ग्राहक फासने वाले दल्ले-----
से ज्यादा घिनौना दलाल लगने लगा है।
सच अब बड़ी पिड़ा होती है वोट देते,
क्योंकि एै "रंग"-------
अब हमारे सदन की सिढ़ियो की तरफ बढ़ता नेता,
उन पवित्र सिढ़ियो का बद्नुमा दाग लगने लगा है।
मुझे नेताओ का घर--------
अब चकलेवालियो के घर से ज्यादा,
नापाक लगने लगा है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002(उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

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