व्यंग्य----( आइए हिंदी में हंसे )
हमारे देश में बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिन्हें कायदे से
हिंदी में हंसे एक जमाना हो गया. अब यह तथाकथित लोग चाहकर भी स्वादिष्ट तरीके से हिंदी में हंस नहीं सकते. क्योंकि यह सभी लोग प्रकृतिक रूप से अपने हंसने की ऐसी तैसी कर चुके हैं. इनके चेहरे और होठों को देख कर कोई अदना सा हिंदी का जानकार भी यह दावे से कह सकता है कि-- यह हिंदी में न हंस पाने के एक ऐसे रेगिस्तान में बदल चुके हैं जो अगर हसेंगे भी तो इनका चेहरा, किसी महानगर के फ्लैट के गमले में लगाए गए नागफनी की तरह दिखेगा.
मुझे तो लगता है कि देश की पूरी जनसंख्या में ऐसे हिंदी में ना हंस पाने वालों की कुल संख्या का अगर सरकारी या गैर सरकारी सर्वे कराया जाए तो मेरा दावा है, कि ऐसे होनहारो की संख्या हमारे देश की कुल जनसंख्या के 20% तक होगी. यह 20% हिंदी में ना हंस पाने "कुपोषण ग्रस्त हंसी के ऐसे पेशेंट" जिनकी प्रतिवर्ष हिंदी में हंसने वालों से बकायदा काउंसलिंग कराई जाए और इस संख्या में से कुछ ऐसे हिंदी में ना हंस पाने वाले डैमेज व्यक्तियों का चयन कर, इन्हें अलग से प्रत्येक आने वाले हिंदी दिवस से पूर्व किसी हंसने हंसाने की डिग्री देने वाले विश्वविद्यालय का छायांकन इनको हिंदी में हंसने की डिग्री क्लास लेकर कराई जाए. अगर संभव ना हो, तो कम से कम इन्हें "हिंदी में हंसने का डिप्लोमा कोर्स" करा दिया जाए.
अगर समय रहते इस विषम मुद्दे पर ध्यान न दिया गया तो यह निश्चित है, कि --"हमारी हिंदी में हंसने की अद्भुत और जादुई कला धीरे धीरे विलुप्त हो जाएगी." यह एक ऐसी छती होगी जिसकी पूर्ति या भरपाई शायद "हड़प्पा या मोहनजोदड़ो के पढ़ाई जाने वाले ऐतिहासिक साक्ष्यों से भी ना हो सके." इसलिए आइए हम और आप सभी मिलकर आज और अभी से अंग्रेजी रीमिक्स या हिंदी के बनावटी ई-वर्जन की हंसी का परित्याग कर अपने होठों पर "लहलहाती व बलखाती" हुई हंसी को धारण करें.
दिनांक--14/3/21 के अमर-उजाला "हास्यरंजनी" में प्रकाशित.
यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758
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