Friday, 26 March 2021

संस्मरण---( जेबुन्निसा की कब्र )

लघुकथा---( जेबुन्निसा की कब्र )

मैंने अपनी नौकरी और अपनी उम्र का एक लम्बा अरसा, लखनऊ में गुजारा है.और मैं उस आधार पर यह बात पुरी दावे के साथ कह सकता हूं कि आप बेशक लखनऊ कि सुबह भूल जाएं लेकिन वहां की खूबसूरत शाम आप कभी नहीं भूल सकते जैसे कि मैं अपनी नौकरी के रिटायरमेंट के बाद भी नहीं भूला, अक्सर मेरे जेहन में लखनऊ की खूबसूरत शाम के साथ ही,लखनऊ की उस मशहूर तवायफ जेबुन्निसा की कब्र की याद भी हो आती है.

जिसके बारे में मैंने वहां के स्थानीय लोगों से जाना था कि, कभी जेबुन्निसा इस लखनऊ की जान हुआ करती थी, जिसके कोठे की दहलीज पर लखनऊ का शायद ही कोई ऐसा रईस या नवाब होगा,जिसके कि पांव जेबुन्निसा के मशहूर कोठे पर न पड़े हो, आज भी उस समय के बचे हुए कुछ पुराने लोग उसकी खूबसूरती और ठुमरी की दाद ऐसे देते है कि जैसे वे अपनी बूढ़ी आंखों से उस खूबसूरत और मशहूर तवायफ जेबुन्निसा को ना सिर्फ देख रहे हो बल्कि उसकी  ठुमरी भी उसकी कोठे पर बैठे सुन रहे हो.


जब मैंने जेबुन्निसा के बारे में यह सब सुना तो खुद को  मैं वहां जाने से नहीं रोक पाया जहां कि जेबुन्निसा को उसके मरने के बाद दफनाया गया था, लेकिन उसकि खूबसूरती और मशहुरियत के मुकाबले जब उसकी कब्र को देखा तो मुझे एक असीम पीड़ा हुई.


क्योंकि जेबुन्निसा की कब्र से यह साफ लग रहा था कि कभी लखनऊ के कोठे कि ये रौशन चराग जीनत जब से यहां दफन हुई तबसे उसके सिरहाने कभी किसी चाहने वाले ने एक अदत चराग भी जलाना गवारा ना समझा.इतना ही नहीं बल्कि जेबुन्निसा की कब्र वहां दफनाए गए सभी लोगों से अलग और काफी दूर बनाया गया था, और यह सब शायद इसलिए किया गया था की कही जेबुन्निसा की कब्र कि मिट्टी उनके दफन वालिदो की मिट्टी को नापाक ना कर दे.

 
फिर भी ना जाने क्यों मुझे उस लखनऊ की मशहूर तवायफ जेबुन्निसा की कब्र से एक अंजानी सी मोहब्बत हो गई और मैं अक्सर जब बहुत तनाव में होता था तो जाकर यूं ही घंटों मैं उसकी कब्र  के पास बैठा करता था, मुझे उसकि कब्र के पास बैठने से एक अजीब सा सुकून मिलता था.

इतना ही नही कभी-कभी तो मैं जेबुन्निसा की कब्र से बात करने की कोशिश भी किया करता था,लेकिन वह खामोश रहा करती थी हां मुझे एकाध बार ऐसा जरूर लगता था कि जैसे जेबुन्निसा अपनी टूटी-फूटी कब्र के पास बैठी  सिसक रही हो उसका यह सिसकना तब तलक जारी रहता था जब तलक कि उसकी कब्र की  झाड़-झंखाड़ के पास कुछ सुखें पत्ते हवा से उड़ कर आ नही जाते थे.

वे सुखें पत्ते ही जैसे अब जेबुन्निसा के,दर्द कि आखिरी ठुमरी सुनने के लिए आते थे.फिर इसके बाद मेरा तबादला मेरी  नौकरी के बचे कुछ वर्षो के लिए मेरे अपने शहर में हो गया.फिर मेरी यादों में लखनऊ की शाम और जेबुन्निसा की कब्र रह गई.


यह लघुकथा मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
दिनांक--27/3/2021

लेखक--- रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P )
mo. no.7800824758.

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