Saturday, 12 July 2025

खत नहीं था

(खत नही था)
जो दी थी उसने कभी लरज़ते हाथ से,
वे खत नही था।
थी उसके धड़कनो की गज़ल,
हर हर्फ में वे थी मेरे रुबरु,
पुरी रात जैसे थी रुबाई की,
चराग जल रहा था----------
उस रौशनी में मोहब्बत थी,
कोई खत नही था।
एक खुशबू थी भीनी सी हर साँस मे,
ये आँख ठहरी रह गई,
सहर होने तलक एै,रंग-------
मेरी अँगुलियो मे वे थी,
कोई खत नही था।
###सहर होने तलक--सुबह होने तलक।

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