तू मेरी, शरीक-ऐ-हयात है, कि-
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.
ये तेरी----
नर्म-नाजूक सी कलाई की छुअन,
हाय !! तू मह़ज़ गिलास है ,
या--
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.
ये शर्म से झुकी नज़र,
उसपे सुर्खी ,तेरे गाल की,
बता तू ,गुलाब है,कि-
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.
ये हवा की शरारत ,
ये उड़ती तेरी जुल्फें,
हाय !!
तू खुबसूरत ढ़लती शाम है,या
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.
टहलना ----
तेरा हौले-हौले यूं छत पे
और मेरा देखना तुमको ,
तू मेरी मुमताज़ है, या ----
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.
यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.
इस चित्र का प्रयोग हमने केवल प्रतीकात्मक रूप से किया है ✍️✍️✍️✍️
रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जौनपुर (U P).
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