Sunday, 10 May 2026

हमदर्द की रूह-अफजा)

(हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा)

तू मेरी, शरीक-ऐ-हयात है, कि-
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

ये तेरी----
नर्म-नाजूक सी कलाई की छुअन,
हाय !! तू मह़ज़ गिलास है ,
या--
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

ये शर्म से झुकी नज़र, 
उसपे सुर्खी ,तेरे गाल की,
बता तू ,गुलाब है,कि-
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

ये हवा की शरारत ,
ये उड़ती तेरी जुल्फें,
हाय !! 
तू खुबसूरत ढ़लती शाम है,या
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

टहलना ----
तेरा हौले-हौले यूं छत पे
और मेरा देखना तुमको ,
तू मेरी मुमताज़ है, या ----
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

इस चित्र का प्रयोग हमने केवल प्रतीकात्मक रूप से किया है ✍️✍️✍️✍️

रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जौनपुर (U P).

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