Saturday, 23 May 2026

बादल रूठ गए हो

(बादल आज रुठ गये है)
जो कभी हरसते थे,
खेत-खेत बरसते थे---------
वे बादल आज रुठ गये है।
माँ के आँचल मे छिप बच्चे डरते थे,
एक जमाना हुआ जब इस तरह-----
बादल गरजते थे।
वे बादल आज रुठ गये है।
वे लह-लहाते तालाब,पोखर खत्म हुये
जहां कभी हम बंसी लगा-----------
मछलियाँ पकड़ते थे।
वे बादल आज रुठ गये है।
वे दादुर,मोर,पपिहा,झिंगुर का गान
पंत,निराला अपनी कविताओ मे लिखते थे,
तब बादल हमारे देश में,
मन के अंदर भी बरसते थे,
ऐ,रंग----वे बादल आज रुठ गये है।

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