Friday, 31 January 2020

लघुकथा---(दंगा )

( दंगा )

उस समय गफूर मिस्त्री मंदिर और मस्जिद दोनो को ही बनाने के लिये मशहूर थे,शायद ही शहर का कोई भी मंदिर-मस्जिद बीना गफूर मिस्त्री के हाथ लगाये पुरा हुआ हो, उन्होंने कभी भी मंदिर- मस्जिद बनाने मे अपने मजहब को आड़े नही आने दिया ,दोनो को उन्होंने उसी मुहब्बत से बनाया व तराशा.

वही गफूर मिस्त्री की अचानक एकदिन अलसुबह गली मेंं चीखो-पुकार सुन कर आँख खुल गई, तो उन्होनें घर के लोगो से पुछा कि ये क्या हुआ ? तो उन्हें घर के लोगो ने बताया कि शहर मे दंगे भडक गये है और रात मे काफी हिन्दू-मुसलमान काट मार दिये गये. कई मंदिर और मस्जिदें जला दी गई.

ये सुन गफूर मिस्त्री के सीने मे दर्द उठा और वे तड़पने लगे तो घर वालों ने उनके सीने को बहुत देर तक मला, तो उन्हें थोड़ी राहत मिली . राहत मिलने पे वे अपनी कंपकपाती अँगुलियों को उठा के रोते हुये बोले--कि जिस मंदिर-मस्जिद को मैने इस गफूर मिस्त्री ने बीना किसी भेदभाव के बनाया था आज उसे शहर के दंगे ने हिन्दू-मुसलमान बना दिया, सच आज केवल गफूर मिस्त्री नही रो रहा बल्कि उसके सीने मे--"उसके बनाये और तराशे अल्लाह व राम रो रहे" .

@@@रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.--222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.--7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

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