Friday, 31 January 2020

लेख--(महात्मा गाँधी-एक विश्व-चिंतन )

 (महात्मा गाँधी--एक विश्व चिंतन)

2 अक्टूबर महज़ गाँधी जयंती ही नही अपितू हमारे इस देश और संपूर्ण विश्व का गौरवशाली क्षण या दिन है.वे स्वतंत्रता आंदोलन की विश्व धरोहर है.उनपे कुछ लिख पाना सहेज पाना संभव नही क्योंकि--"वे खुद मे किताब के प्रथम पृष्ठ व आखिरी पृष्ठ है". इस बार महात्मा गाँधी की ये 150 वी जयंती है.महात्मा गाँधी की जयंती को "अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस" के रुप मे मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2007 मे ही कर दी थी.

महात्मा गाँधी हमारी स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक थे.इन्होंने दक्षिण अफ्रीका में काले-गोरो का भेद मिटाने के लिये सफल लड़ाई लड़ी,उन्हें स्वयं रेल के डिब्बे से बेइज्जत कर के बाहर फेक दिया गया था.इस विजय के साथ जब 1915 मे वे भारत आये,तो यहा भी हालात कमोबेश उससे खराब ही थे.सच तो ये है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन मे जिस महात्मा गाँधी को आज पुरी दुनिया जानती है--"उस महात्मा गाँधी का जन्म उसी सफल आंदोलन की गर्भ से हुआ".चूंकि महात्मा गाँधी ने अपने बैरिएस्टर की पढ़ाई यूनिवर्सिटी कालेज लंदन से की थी,इसलिये उन्हें काफी हद तक मानव स्वतंत्रता व उसके मूल अधिकारों की जानकारी थी.

महात्मा गाँधी को सर्वप्रथम--"महात्मा गाँधी कहकर राजवैद्य जीवन राम कालीदास ने संबोधित किया".आजाद हिंद फौज के नेताजी सुबाष चन्द्र बोष ने 1944 मे रंगुन रेडियो से--"उन्हें पहली बार राष्ट्रपिता कहा".इतना ही नही बल्कि अपने समय के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक अल्बर्ट आइस्टिन ने 2 अक्टूबर 1944 को उनके 75 वे जन्मदिवस पे अपने खत में लिखा कि--"आनेवाली नस्ले शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता फिरता था".जबकि अल्बर्ट आइस्टिन महात्मा गाँधी से उम्र मे 10 वर्ष छोटा था,और महात्मा गाँधी से कभी भी उसकी मुलाकात आमने सामने न हुई थी वे एक दुसरे से खतो मे मिला करते थे,ये उस महात्मा गाँधी का प्रभाव था.

महात्मा गाँधी आज बेशक दुनिया मे नही है फिर भी यूँँ लगता है कि जैसे वे--" हम लोगो के साथ जीवित है,चल रहे है,प्रांसगिक है उन्हेंं आने वाली सदियों ने भी शायद अपने पास हमेशा के लिये सहेज रखा है".

महात्मा गाँधी ने हमेशा ऐसे मार्ग का चयन किया जहा सिर्फ और सिर्फ अहिंसा थी,ये अहिंसा कितनी मूल्यवान है,इसे हर कालखंड स्विकारता है आने वाले कल भी स्विकारेगा क्योंकि--"हिंसा नष्ट करती है और अहिंसा निर्माण".हा ये सच है कि हम और हमारी पीढ़ियों ने भी गाँधी को नही देखा,उनके चिंतन को नही समझा,गाँधी पे बहुतो के आरोप भी लगते है इसके पक्ष व विपक्ष में तर्क भी दिये जाते है.

लेकिन मैने अपनी दादी व उनके उम्रवय के लोगो से जिज्ञासावस महात्मा गाँधी के बारे में  पुछा तो उनका दिया जवाब मेरे अब तलक के जीवन के--"सबसे मूल्यवान और सुखद सुनने के क्षणो मे एक धरोहर की तरह हमेशा के लिये घर कर गया".उन्होंने कहा बेटा महात्मा गाँधी को तुम ही नही इस देश के न जाने कितने लोग नही समझ पायेंगे.

वे उनकी दुबली-पतली सी काया कितनी महान थी कि उनके पीछे उनकी एक आवाज पे--"जो जिस स्थिति मे होता बिना सुध-बुध के रेला का रेला चल पड़ता था".दादी और उनके उम्रवय के लोगो ने कितना सच कहा था "आज हम स्वहित व राष्ट्रहित में सौ-पचास भी नही चल पाते उस देश में महात्मा गाँधी ने राष्ट्रहित व देश की स्वतंत्रता के लिये करोड़ो को चला दिया".उनके सारे आंदोलन विश्वव्यापी होते थे व अग्रेंजी हुकूमत की बर्बरता की चूले हिला देते थे.सच तो ये है कि--"अग्रेजों की बर्बरता की लाठियां भी उस महात्मा गाँधी से नतमस्तक हो जाती थी".

स्वतंत्रता के लिये इस अहिंसा के पुजारी को कई वर्ष जेल मे भी रहना पड़ा.उनके आंदोलन चाहे 1930 का नमक सत्याग्रह हो,चाहे 1942 का असहयोग आंदोलन अपने मंतव्य को सफल रहे.महात्मा गाँधी स्वतंत्रता आंदोलन के एक कुशल महानायक ही नही अपितु एक उत्कृष्ट लेखक भी रहे उनकी आत्मकथा--"सत्य का प्रयोग" से ये साबित होता है,ये पुस्तक "गाँधी के चिंतन व लेखन को समझने वाले आज भी इसे किसी विश्व लेखक की तरह पढ़ते है"

महात्मा गाँधी किसी को आदर्श समझाने से पहले उसे स्वयं अपने आचरण में लाते थे यही कारण है कि वे अब " सादगी की प्रतिमूर्ति की तरह हमेशा के लिये इस विश्व के स्मृति पट पे दुनिया के जीवित रहेंगे". उनकी सादगी,सौम्यता, शाकाहार सब आज की परिकल्पना में बेमेल लगे लेकिन सच है.उनका "वैष्णव जन ते तैनो कहिये या रघुपति राघव राजा राम जैसे अब भी इस संत के साबरमती आश्रम में गुज रहा हो".बेशक इस अहिंसा के पुजारी को--"नाथूराम गोडसे ने अपनी हिंसा से मार दिया हो,लेकिन नाथूराम का वे आक्रोश और उसके पिछे का तर्क विफल हुआ और महात्मा गाँधी की अहिंसा जीत गई और हमेशा जीतेगी,क्योंकि महात्मा गाँधी व्यक्ति नही विश्व-बारुद की जहरीली साँसो की एकलौती दवा है".


यह लेख मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

@@लेखक--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

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