हमारे गाँव में सबसे पहला "इज्ज़त घर" बनवाने का श्रेय बंसीलाल को जाता है. हालांकि मैने जितनी आसानी से बंसीलाल और उनके पहले इज्ज़त घर बनवाने की बात लिख दी वे मेरे लिखने जितना आसान न था. इसके लिये बंसीलाल को तमाम ग्रामीण झंझावातों का सामना करना पड़ा. उनके खिलाफ तरह-तरह की कानाफूसी हुई,चोरी छिपे पंचायते बुलाई गई, उनपे गाँव के बिगाड़ने के आरोप लगाये गये. हद तो तब हो गई जब उनके खिलाफ टोने-टोटके होने लगे.
"कई गाँव-गिराव के तांत्रिकों ने अपने तांत्रिक शैली में बंसीलाल के नाम से नीबू काटे".लेकिन बंसीलाल मे ये इंकलाब यूहीं नही आया था,इसके मूल मे उनकी साक्षर बहू का बहुत बड़ा योगदान था,हालांकि बंसीलाल के मन मे पहले से ही मुख्यधारा के प्रति-ललक व इच्छा थी लेकिन गाँव-गिराव से बगावत का मन मे एक भय था. बहू के आने से पहले ही उसने अपनी पत्नी और बहन के चेहरे पे वे भय बंसीलाल ने बखूबी देखी थी.
जब उसकी पत्नी और बहन गहरे-अंधेरे मे डरी-सहमी सी हाथ मे लोटा लिये घर से शौच जाने के लिये निकलती थी,तो उनके पाँव-"मन-मन भर के होते थे",उनके मन मे एक अजीब सा डर व भय रहता था, कि कही कोई फबत्ती न कस दे,कोई मनचला रास्ते में शरारत न कर दे,लेकिन वही बहन और पत्नी जब सकुशल घर लौट आती थी, तो उनके चेहरे पे लौटने की खुशी साफ दिखती थी,बंसीलाल जी मसोसकर रह जाता और ये सोचता कि- कास इनकी ये खुशी वे इनके चेहरे पे प्रतिदिन की खुशी मे वे बदल पाता.लेकिन ये पत्नी और बहन की खुशी केवल अगले दिन शौच जाने तक ही रहती.
बंसीलाल की इस इच्छा को पुरी करने के लिये जैसे भगवान ने भी , बंसीलाल का चयन गाँव के पहले इज्ज़त घर के लिये कर लिया हो. तभी तो उसके घर गाँव मे सबसे ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू को, इसके घर बहू के रुप मे भेज दिया. उसकी बहू ने जैसे ही बाबू जी कहकर ये कहना शुरु किया कि--"बाबू जी आज तमाम अखबार, टीबी मे ये दिखा व बता रहे है कि घर मे शौचालय की कितनी जरुरत है,घर से बाहर शौच को गई बहु-बिटियो के साथ किस तरह बलात्कार व उनकी नृशंस हत्यायें हो रही है".
उसकी बहू के कहे एक-एक वाक्य बंसीलाल के कलेजे को चुभ रहे थे,आंदोलित कर रहे थे,पहले से ही ये बात उनके मन मे थी,लेकिन गाँव की भय से वे मौन हो जाते थे लेकिन आज वे अकेले नही पुरा परिवार उनके निर्णय के साथ था,ये खुशी बंसीलाल से ज्यादा उनकी पत्नी,बहन,बिटिया और बहु की गीली आँखो मे दिख रही थी उन्होनें भी मारे खुशी के घर में रंखे फावड़े को उठाया और "गाँव के पहले इज्ज़त घर की नीव रख दी".
शौच मुक्त भारत का ये "इज़्जत घर" केवल किसी सरकार का समर्थन या राजनीति नही,बल्कि न जाने कितने बंसीलाल के गाँवो-घरो की बहू-बेटियों के आत्मसंम्मान का पहला "इज्ज़त घर" है.आईये हम सभी बंसीलाल अपनी-अपनी बहुओं को मुँह दिखाई में कुछ दे या न दे पर उनके हाथ में हम उन्हेंं "इज्ज़त घर" की एक चाभी अवश्य दे.
यह लघुकथा मेरी स्व-लिखित व अप्रकाशित है.
लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758
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