Friday, 31 January 2020

(अयोध्या--के पच्छ में सुप्रीम फैसला )

(अयोध्या---रामलला के पक्ष मे सुप्रीम फैसला)


अयोध्या ने तमाम झंझावात व उतार-चढ़ाव देखे,पर कभी भी सरयू और अयोध्या ने अपने प्रेम और सौहार्द का धैर्य नही खोया, जबकि इसे बार-बार तरह-तरह से चोटे दी गई,इतने लंबे समय और कालखंड तक भारत के किसी भी धार्मिक स्थल का विवाद नही चला, जितना की अकेले रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का चला. लेकिन कहते है ,कि अंत भला तो सब भला.यानी अयोध्या के सारे विवादों की इस पटकथा का अंत. अंततः सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम निर्णय से हुआ और ये ऐसा एतिहासिक सुप्रीम निर्णय है जिसमे हमारे प्रधानमंत्री के कथनानुसार-"ना किसी की जीत हुई और ना किसी की हार."

रामलला का ये विवाद 1858 से चला आ रहा था, इस बीच तमाम कालखंड और समय अपनी करवटे बदलता रहा,हाँँ अगर इस कालखंड और समय के बीच कुछ नही बदल रहा था, तो वे रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का विवाद था. इसे खत्म होने को कौन कहे ये हमेशा वैसे ही सुलगता रहा,हाँँ इस सुलगने की वृद्धि या इजाफा इसमें जरुर होता रहा.एक के बाद एक मुकदमे और इसके पक्षकार बढ़ते गये,लेकिन इनमे से कुछ महत्वपूर्ण शुरुआती चार मुकदमे दायर हुये थे उनमे से एक-"16 जनवरी 1950 में गोपाल सिंह विशारद का है-जिनकी मौत के 33 वर्ष बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने पुजा करने का अधिकार दिया".

रामलला और बाबरी मस्जिद के विवाद का मसला हाइकोर्ट के निर्णय के बाद ही सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. क्योंकि हाइकोर्ट के फैसले को किसी भी पक्ष ने स्विकार नही किया.लेकिन इस फैसले और सुनवाई से पहले सुप्रीम कोर्ट ने सभी को आपसी सुलह और समझौते से इस पूरे मामले को हल करने का सुअवसर व मौका दिया,लेकिन कोई भी हल न निकल पाने और समय सीमा खत्म हो जाने पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गगोई ने चालीस दिन लगातार सुनवाई कर इस विवादित मसले को अपने रिटायर होने से पहले ही निबटारे का एक जस्टिस निर्णय लिया और इस मसले का सारगर्भित और एतिहासिक निर्णय व फैसला सुनाया भी.

हालांकि इस चालीस दिन की लगातार सुनवाई से मुस्लिम पक्ष के या बाबरी मस्जिद पक्ष के लोगो ने असंतोष जाहिर किया. हाँँ इस निर्णय से पहले सबसे महत्वपूर्ण बात रही,कि पक्षकार तो पक्षकार सभी हिन्दू और मुसलमान भाईयो ने ध्वनिमत से कहा कि--"सुप्रीम कोर्ट का जो भी निर्णय आयेगा हम अपनी पूरी मोहब्बत और प्यार से उसे स्विकार करेंगे" किया भी यानी ये "विवाद की विजय नही बल्कि प्रेम और सौहार्द की विजय हुई" कुछ राजनीति करने वाले जो इस सुप्रीम निर्णय के फैसले के बाद के ईधन और आग की उम्मीद किये थे, वे अपना सा मुँह लिये रह गये अर्थात उनकी 'राजनीति का तवा इस निर्णय के बाद जैसे उन्ही पे हँस रहा था".

सुप्रीम कोर्ट का ये सुप्रीम निर्णय 1045 पेजो पर लिखा गया,जिसमे 929 पेजो पर सभी जजो ने एकमत से फैसला लिया,116 पेजो पर एक जज की राय और जजो से अलग अथवा भिन्न थी लेकिन उनके नाम का जीक्र नही किया गया ये सही भी है क्योंकि आवश्यक नही कि हर बिन्दु या निर्णय पे सभी जज का विचार एक ही हो अगर एक ही हो जाये तो सुप्रीम कोर्ट मे बैठे मीलार्ड के फैसले को आम जन-मानस स्विकार तो लेता  "लेकिन?" जैसे प्रश्न के साथ जो कि कतई सही नही था,इससे ये साबित होता है कि इस-"सुप्रीम फैसले मे कोई बिन्दु छुटा नही अर्थात् भारत और अयोध्या के इस प्राचीन विवाद का सुप्रीम निर्णय हुआ".

इस सुप्रीम निर्णय की सुप्रीम पीठ के पाँच बेहतरीन और मीलार्ड जैसी गरिमा को सुशोभित करने वाले वे सर्वोच्च विद्वत सदस्य जिनके नाम निम्नवत है-
(1) जस्टिस एस. ए.बोबड़े
(2) डी. वाई. चन्द्रचूड़
(3) अशोक भूषण
(4) एस एन जीव
और स्वयं पाँचवे चीफ जस्टिस--
(5) रंजन गगोई.
चीफ जस्टिस रंजन गगोई चूंकि पता था कि वे 17/11/2019 को रिटायर होने वाले है.अतः उन्होंने सारे पक्षो की सुनवाई के बाद फैसले को अपने पास सुरक्षित रख लिया था,ये सर्वविदित भी हो गया था कि रामलाल और बाबरी का फैसला 17 तारीख से पहले ही आ सकता है और ऐसा हुआ भी इस निर्णय को सुनाने से पहले उन्होंने सुरक्षा के तमाम पहलुओं की गहन मंत्रणा की उन्हे तलब भी किया,उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर भारत के गृहमंत्री तक सभी को सुरक्षा के इंतजमात मे तल्लीनता के साथ खुद लगे रहना पड़ा और पल-पल की जानकारी बीच-बीच में प्रधानमंत्री को भी देते रहे थे. यानी इसे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गगोई के मंशानुसार पूरी गंभीरता से लिया गया.

जैसा कि लोगबाग और मीडिया को उम्मीद थी कि ये सुप्रीम निर्णय किसी अवकाश के दिन ही आयेगा और आया भी.यानि 9/11/2019 को सेकंड सटरडे व उसके दुसरे दिन रविवार की छुट्टी थी को आया.इस निर्णय को सुनाने से पहले चीफ जस्टिस रंजन गगोई ने-वकीलो पत्रकारों से भरे कक्ष मे कहा कि मै इस फैसले को सुनाने के लिये महज़ पैतालीस मिनट लुँँगा.और वाकई उन्होनें केवल पैतालीस मिनट ही लिया--इन पैतालीस मिनटो मे उन्होनें पूरे अयोध्या राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद के मुख्य-मुख्य बिन्दुओं को पढ़ा.

न्यायपीठ ने कहा कि--"विवादित ढाँचे मे ही भगवान राम के जन्म होने की अवधारणा व आस्था हिन्दुओं की अविवादित है".यही नही पुरातत्व की खुदाई मे बाबरी मस्जिद के नीचे से प्राप्त हुई सीता की रसोई, राम-चबूतरा और भंडारगृह की उपस्थिति इस स्थान के धार्मिक तथ्य की गवाह है. हालांकि न्यायालय ने कहा कि-"सिर्फ आस्था और विश्वास के आधार पर मालिकाना हक स्थापित नही किया जा सकता हा ये विवाद खत्म होने के सुचक हो सकते है".
साथ ही न्यायालय ने ये भी कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड अपनी दावेदारी को पुख्ता पेश कर पाने मे विफल रहा.

कोर्ट चूंकि अपने निर्णय की शुरुआत मे ही शीया वक्फबोर्ड व निर्मोही अखाड़े के दावे को खारिज़ कर दिया था.ये मसला केवल सुन्नी वक्फबोर्ड और हिन्दू पक्ष के बीच का था क्योंकि दोनो पक्षो के मसले तर्कसंगत थे और ये दोनो महज़ इस पुरे मसले मे रोड़े की तरह थे.हिन्दू पक्ष के वकील- के. परासन,पी. एस. नरसिम्हा, रंजीत कुमार, हरिशंकर जैन, सी. एस. वैद्यनाथन, पी. एन. मिश्रा, सुशील कुमार जैन जयदीप गुप्ता थे. जीसमे पूर्व अटार्नी जनरल के. परासन ने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट मे बहस करते हुये-पौराणिक साक्ष्यों व तथ्यो के आधार पर विवादित ढाँचे पे मंदिर होने की जोरदार तरीके से दलीलें पेश की जो कि अंत तक इस एतिहासिक निर्णय की धुरी बना रहा.अतः चीफ जस्टिस रंजन गगोई  और उनके ज्यूरी के चार अन्य प्रमुख जजो की पीठ को भी इस साक्ष्य ने अपना फैसला मंदिर पक्ष मे देने को विवश किया.

मुस्लिम पक्ष के प्रमुख वकील राजीव धवन ने मुस्लिम पक्ष के मालिकाना हक की दलील पेश की.जफरयाब जिलानी मुस्लिम पक्ष की ओर से कोर्ट मे पेश हुये और इमाम के वेतन आदि के सुबूत पेश कर वहां मस्जिद होने का दावा किया.वकील निजामुद्दीन पाशा ने-"पवित्र कुरान की आयतो के आधार पर देश की सबसे बड़ी अदालत मे इस्लामिक कानून व वहां पर मस्जिद होने की तगड़ी बहस की.इन सारे दलीलों को साबित न कर पाने की स्थिति मे कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष अर्थात सुन्नी वक्फबोर्ड के वहां पर बाबरी मस्जिद होने के दावे को खारिज़ कर दिया.

इस सारे विवाद के निबटारे मे सर्वोत्कृष्ट भूमिका 1990 व 1992 के उत्तर-प्रदेश के पुरातत्व विभाग की खुदाई मे मिले वे साक्ष्य है जो अंत तक कोर्ट नकार ना पाया. जिसने हिन्दू पक्ष के दावे को पुख्ता व मजबूत किया ये वही समय है जब आडवाणी जी सोमनाथ से अपनी रथयात्रा कारसेवकों के साथ लेकर अयोध्या के लिये निकले थे.हालांकि कि इस बीच तमाम हालात ऐसे थे जिनका जीक्र किसी भी लिहाज़ से करना आज प्रासंगिक न होगा. क्योंकि आज हमारा देश शांति और शौहार्द से उनपे अपनी विजय श्री पाली है. 

ए एस आई टी की रिपोर्ट के हवाले से चीफ जस्टिस रंजन गगोई ने कहां कि--"खुदाई से मिले पुरातत्व के साक्ष्य से ये साबित होता है कि मस्जिद के नीचे एक विशाल संरचना थी,जो इस्लामिक नही थी,वहां प्राप्त हुई कलाकृतियां इस्लामिक नही थी,ए एस आई (पुरातत्व विभाग) ने इन संरचनाओं को-"12 वी सदी का मंदिर बताया है". हालांकि 12 वी सदी से 16 वी सदी तक वहांं क्या होता रहा इसका प्रमाण नही मिल पाया है,लेकिन क्रास एक्जामिनेशन के बाद भी वहा मंदिर होने का हिन्दुओं का दावा झुठा साबित नही हुआ. पुरातत्व विभाग ने हिन्दू और मुस्लिम दोनो पक्षकारों की मौजुदगी में 100 रंगीन व श्वेत श्याम तस्वीरों की फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी करायी.

अयोध्या राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के फैसले के अहम बिन्दु------
(1) कोर्ट ने कहा कि मस्जिद के नीचे कोई भी इस्लामिक ढ़ाचा नही मिला.
(2) मुस्लिम पक्ष अपना दावा सशक्त तरीके से पेश नही कर पाया.
(3) जमीन बटवारे का हाइकोर्ट का फैसला कही से तार्किक व न्यायसंगत नही.
(4) भगवान श्रीराम के जन्मस्थान के दावे का विरोध नही.
(5) आस्था पर किसी भी तरह का विवाद नही.
साथ ही कोर्ट ने अपनी टिप्पणी भी इस विवाद के फैसले के तहत की जो निम्नवत है----
(1)मस्जिद को यूँँ ढ़हाया जाना सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन था.
(2)कोर्ट ने रामलला को कानूनी व्यक्ति माना.
(3) साथ ही कोर्ट ने पुरसंगत ये टिप्पणी की कि मे इस विवादित जगह पे मस्जिद थी.
कोर्ट ने साथ ही उन तीन कमेटी के सदस्यों की प्रशंसा भी की जिनमे कलीफुल्ला, श्रीराम पंचू और श्री श्री रविशंकर जी थे. जिन्होंने इस विवाद को आपसी सहमति से निबटाने का भरपुर प्रयास किया.

इसके साथ ही कोर्ट ने सबसे महत्वपूर्ण जो निर्णय लिया वे मंदिर निर्माण व उसकी कार्य योजना का जिम्मा सरकार को देने के साथ ही अयोध्या मे ही कही मुस्लिम पक्ष को पाँच एकड़ जमीन उनके मस्जिद के लिये मुहैय्या कराने की जिम्मेदारी सौपी.पूनर्विचार याचिका दायर करने के लिये कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को तीस दिन तलक का मौका दिया.इस निर्णय के आने के बाद प्रधानमंत्री ने खुद इशारो से अपनी बात स्पष्ट करते हुये कहा कि-"अब ये देश किसी अन्य मंदिर और मस्जिद के नये विवाद के लिये तैयार नही".यानी स्पष्ट है कि आईये हम आप और सब देश के नव-निर्माण में लगे.

अयोध्या का अर्थ ही है जिसे किसी भी युद्ध मे हराया ना जा सके और वाकई "विवाद से लेकर फैसले तलक अयोध्या हारी नही".इस विवाद के दो खास पक्षकार परमहंस रामचंद्र दास और हाशिम अंसारी आज जीवित नही लेकिन उनका सौहार्द और उनकी मित्रता अयोध्या मे आज भी जीवित है.मुझे खुद लग रहा जैसे इस फैसले के बाद दोनो एक साथ हँसते हुये कोर्ट से निकले हो एक दुसरे को जीत की बधाई देकर  एक ही रिक्शे पे बैठे हो. अयोध्या मे कभी होली का रंग हाशिम को लगा तो कभी ईद की सीवई को पूरी चटखारे के साथ परमहंस रामचंद्र दास जी ने पूरी मस्ती और चटखारे के साथ खाया.मंदिर और मस्जिद के विवाद की सारी पटकथा का सुप्रीम कोर्ट मे सुप्रीम अंत जरुर हुआ. लेकिन इस सुप्रीम अंत मे भी हमारे देश और अयोध्या के शांति,सद्भाव, प्यार की सुप्रीम मोहब्बत जीत गई.


यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

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