बसंत प्रकृति पर्व के साथ ही, युवा उन्माद और उमंग का एक रसमय पर्व भी है.ये कामदेव के साथ रति-- "की कलात्मक छेड़छाड़ की वे शास्त्रीय अभिव्यक्ति है, जिससे हमारे देश को छोड़कर , बाकी विश्व दुनिया वंचित है". हमारे आस-पास के वातावरण में एक मकरंद, महक व खुशबू हवा के झोंके से हमारी सांस-सांस में कुछ इस तरह से घुल-मिल जाती है कि-" हमारे मन के बसंत का जादू, किसी नायिका के
उस पिले सलवार सी हो जाती है, जहाँ काव्य के सरसो के फूलों रूपी नायिका अपनी युवा ख़ूबसूरती से साहित्य भ्रमर को ललचाती है".
बसंत प्रकृति की सबसे बेहतरीन और खूबसूरत वे जिन्दा पेंटिंग है,जहा की उकेरी गई मादकता भी हमें कामांध नही करती, ये पूरी उम्र वाटिका की भ्रमर-अनुगूंज है, जिसे पुरे बसंत मतवाला भ्रमर इस डाली से उस डाली एक प्रेम राग के रसीक की तरह मंडराता व गाता फिरता है और आये हुये प्रकृति बसंत का चुम्बन वे फूल दर फूल लेने की अपनी बसंत लिप्सा मे अपने मन की रमणीयता का बासंतिक रसास्वादन करता है, एक तरह से भ्रमर को हम प्रकृति बसंत का वे सजीला नौजवान कह सकते है जिसके लिये बसंत, अकेले प्रेम का-विश्व महीना है.
बसंत महीने को हम राग व ध्वनि का महीना भी कहते है.इस माह के राग-ध्वनि का सर्वोपरि गायक व संगीतकार आम की मंजरियो
का वे सिरमौर है जिसके वाद्य-शास्त्र से सुशो भित ध्वनि की कलात्मक अभिव्यक्ति को हम सभी प्रकृति प्रेमी आम बोलचाल की भाषा में उसको--राग कोयल के नाम से जानते है. उसके गले से निकली कुक चहुओर दिशाओ में प्रेम की अभिव्यक्ति है, जहाँ साहित्य, संगीत, साधना के साथ ही नायिका के परदेश में रह रहे नायक का संयोग व वियोग श्रृंगार है.
बसंत केवल माह या महीना नही बल्कि हमारे आस-पास की प्रकृति प्रदत्त केनवास पे वे तमाम जीवित चित्र है जिसे अपने तूलिका या ब्रश से रंगने के लिये ईश्वर अपनी दुनिया के बेहतरीन कलाकार भेजता है. यानि कि ये हम कह सकते है कि--बसंत का महीना हमारे देश में कमोबेश सभी को अपनी चपेट मे लेता है चाहे वे-कुंवारे हो, गृहस्थ हो, साधु-संत हो, पशु-पंछी हो यानि की इस प्रेम के एकाकार का नाम ही बसंत है.
भारत मे बसंत और प्रेम पुरी विश्व-दुनिया से अलग है. इसमें नायक और नायिका का प्रेम कही प्रतिकात्मक तो कही इतने कलात्मक हो जाते है कि शब्द गौड़ व मौन हो जाते है. नायक और नायिका की सारी अभिव्यक्ति उनके कापते होंठ व उनकी झुकी नजर से व्यक्त हो जाती है, ये मनोरम दृश्य व ये रमणी यता केवल यही ख़त्म नही होती बल्कि घर लौटी हुई ननद से उसकी भाभी की छेड़छाड़ की शास्त्रीयता है. सच हमारे देश मे भाभी केवल रिश्ता ही नही बल्कि--"सच्चे अर्थो मे देवर और ननद के शरीर मे हो रहे युवा परिवर्तन की वे पूर्ण बसंत है" भाभी जैसे रिश्ते का सानिध्य--हमारे अंतर्मन के युवा बसंत को कही से अपवित्र या कलंकित नही होने देती.
लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
पता-जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर, pin-222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758
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