मुझे बहुत पसंद है--फुटपाथ पे वे जुड़े बेचने वाली लड़की,सीधा-सादा सा बीना किसी मेकप या धोखे से पुते उसका मासूम चेहरा! बीन व्याह के भी रोज बीना नागे उसे करीब और करीब से देखने की चाह में खरीद लाता हूं उससे मै बीना मतलब एक जुड़ा।
मेरे इस सीलसीले को दो साल होने को आये,बस हमेशा की तरह वे मुझे जुड़े देती है और मै उसके पैसे! शायद उसे भी मेरी इस बात का एहसास भर है लेकिन वे चुप है शायद उसके अंतस में--आधुनिक लड़कियो सा उच्छृंखल भाव नही। आज ये सोच मै घर से निकला हूं कि चाहे जो हो आज आफिस से छुटते और लौटते वक़्त हमेशा की तरह फिर उससे जुड़ा खरीदुंगा और आज उसे पैसा देने से पहले अपने दिल की हर बात कह लुंगा क्योंकि अगर मैने अब भी देर की तो कही एैसा न हो कि मेरे न कह पाने की वजह से "हमेशा के लिये जुदा हो जाये हमसे इस फुटपाथ पे ये जुड़ा बेचने वाली लड़की"।
आफिस टाइम खत्म होते ही जब मै उस फुटपाथ की तरफ़ बढ़ा तो लगा जैसे कि आज मेरे पाँव लरज रहे थे,ये वही फुटपाथ और पाँव थे जिससे मै अब से पहले बड़ी उतावली मे पहुँच लिया करता था,लेकिन आज वही उतनी दूरी मुझे तय करने मे पसीने छुट रहे थे।अचानक से पता नही क्यू आज पहली बार इस तरह एक बार तक--फिर अपने जुड़े इधर-उधर कर अपने को जैसे वे भी आज बहला रही थी।मैने पर्स निकाले और उसे आज भी वही एक जुड़ा देने को कहा,उसने भी रोज की तरह जुड़ा उठाया और मुझे थमा दिया।
लेकिन आज मै उससे जुड़े लेने के बाद अपने जुड़े वाले हाथ को वापस नही किया अपितु मैने उससे कह दिया--"कि शायद तुम नही जानती कि मै बीना व्याह के सिर्फ तुम्हें और तुम्हें देखने की खातिर मै एक जुड़े रोज प्रतिदिन खरिदता रहा,लेकिन मै आज अपने आपको रोक नही पा रहा प्लीज बताओ--क्या तुम मेरी जीवनसंगिनी बनोगी? क्या मै तुम्हें अपना बना पाऊँगा?"।
तो अचानक से उसने जुड़े को थाम ये कहा कि मै जानती हूं कि आप पिछले दो सालो से--आप बेवज़ह मुझसे जुड़े लेते रहे,लेकिन मै कहा और आप कहा के अंतर से डरी रही बाबू मुझे स्वीकार है और मै आपको ये विश्वास दिलाती हूँ कि कभी नही बदलुंगी आपकी जीवन- संगिनी बन,"आपके प्रेम और प्यार के इस फुटपाथ पे हमेशा खरी उतरेगी ये गरीब जुड़े बेचने वाली लड़की"।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758
मेरे इस सीलसीले को दो साल होने को आये,बस हमेशा की तरह वे मुझे जुड़े देती है और मै उसके पैसे! शायद उसे भी मेरी इस बात का एहसास भर है लेकिन वे चुप है शायद उसके अंतस में--आधुनिक लड़कियो सा उच्छृंखल भाव नही। आज ये सोच मै घर से निकला हूं कि चाहे जो हो आज आफिस से छुटते और लौटते वक़्त हमेशा की तरह फिर उससे जुड़ा खरीदुंगा और आज उसे पैसा देने से पहले अपने दिल की हर बात कह लुंगा क्योंकि अगर मैने अब भी देर की तो कही एैसा न हो कि मेरे न कह पाने की वजह से "हमेशा के लिये जुदा हो जाये हमसे इस फुटपाथ पे ये जुड़ा बेचने वाली लड़की"।
आफिस टाइम खत्म होते ही जब मै उस फुटपाथ की तरफ़ बढ़ा तो लगा जैसे कि आज मेरे पाँव लरज रहे थे,ये वही फुटपाथ और पाँव थे जिससे मै अब से पहले बड़ी उतावली मे पहुँच लिया करता था,लेकिन आज वही उतनी दूरी मुझे तय करने मे पसीने छुट रहे थे।अचानक से पता नही क्यू आज पहली बार इस तरह एक बार तक--फिर अपने जुड़े इधर-उधर कर अपने को जैसे वे भी आज बहला रही थी।मैने पर्स निकाले और उसे आज भी वही एक जुड़ा देने को कहा,उसने भी रोज की तरह जुड़ा उठाया और मुझे थमा दिया।
लेकिन आज मै उससे जुड़े लेने के बाद अपने जुड़े वाले हाथ को वापस नही किया अपितु मैने उससे कह दिया--"कि शायद तुम नही जानती कि मै बीना व्याह के सिर्फ तुम्हें और तुम्हें देखने की खातिर मै एक जुड़े रोज प्रतिदिन खरिदता रहा,लेकिन मै आज अपने आपको रोक नही पा रहा प्लीज बताओ--क्या तुम मेरी जीवनसंगिनी बनोगी? क्या मै तुम्हें अपना बना पाऊँगा?"।
तो अचानक से उसने जुड़े को थाम ये कहा कि मै जानती हूं कि आप पिछले दो सालो से--आप बेवज़ह मुझसे जुड़े लेते रहे,लेकिन मै कहा और आप कहा के अंतर से डरी रही बाबू मुझे स्वीकार है और मै आपको ये विश्वास दिलाती हूँ कि कभी नही बदलुंगी आपकी जीवन- संगिनी बन,"आपके प्रेम और प्यार के इस फुटपाथ पे हमेशा खरी उतरेगी ये गरीब जुड़े बेचने वाली लड़की"।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (उत्तर-प्रदेश)।
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