शहर से दुर पड़ने वाली बस्ती की एक जर्जर झोपड़ी के बाहर,उस बस्ती की तमाम औरते जुटी आपस में कानाफूसी कर रही थी, उसका कारण था उस झोपड़ी में रहने वाली वह औरत जो झोपड़ी के बाहर काफी सारा दिन निकल आने के बावजुद भी पागलो की तरह बैठी अपनी गोदी में लिटाए हुए बिटिया को थपक रही थी.
लेकिन उस औरत के थपकने के बाद भी उसकी बिटिया में कोई भी हरकत नही हों रही थी. तभी उन औरतों में से एक औरत जो कि देखने और अपने बात करने से ही साफ लग रही थी कि वह औरत इस बस्ती की सारी औरतों की चोधरी थी, ने जाकर उस गोद में ली हुई बिटिया की माँ को जोर से झिझोड़ा तो अचानक उस औरत ने कहा धीरे बोलो चाची अभी मुन्नी जाग जाएगी.
लेकिन उस चाची ने मानो कुछ भी ना सुना हों उसने बड़ी जोर से उस औरत की गाल पर तमाचा मारा और कहा कि पागल हों गई हों चंपा तुम्हारी बिटिया तो ना जाने रात में कब कि मर चुकि है. इतना सुनते ही चम्पा चीख उठी नही और फिर बेहोश हों गई.
जब चंपा को पानी के छींटे मारकर उसे होश में लाया गया तो चंपा चुपचाप उठी और अपनी झोपड़े के अंदर से जब वह लौटी तो उसके हाथ में एक लोहे का तवा था जिसे वह बस्ती की सभी औरतों को दिखाती हुई बोली देखो तो चाची यह तवा कितना गरम है ना अभी मैं इसपे गरम-गरम रोटियां सेक कर मुन्नी को खिलाऊंगी.
उसकी इस हरकत से बस्ती की सारी औरतें जान गई कि चंपा को बिटिया के मर जाने का तगड़ा झटका लगा है और लगे भी क्यों ना आखिर सारी रात उसने अपनी भूख से बिलबिला रही बिटिया को गोल से रोटी के आकर के चाँद को दिखा-दिखाकर अपनी बेटी को उस रोटी के पक जाने का झूठा दिलाशा देकर सुलाने की कोशिश करती रही, लेकिन इस दिलाशा को टूटना था और अंततः इस दिलाशा के टूटते ही इसकी मासूम बेटी के प्राण-पखेरू उड़ गए.और एक माँ के वात्सल्य का तवा हमेशा-हमेशा के लिए ठंडा हो गया.
यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo. no.7800824758
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