( राम )
तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को----
सब खींच रहे है राम.
तेरी नगरी मे,
तुम्हें टेंट से ढ़ककर,
मंदिर यहीं बनायेंगे----
बस चीख रहे है राम.
हर चुनाव के मुद्दे मे,
बस भुना रहे अयोध्या को,
कुछ न किया और कुछ न करेंगे,
सच तो ये है कि,
ये नकली भक्त है आपके सारे,
जो अपने-अपने स्वार्थ का चंदन---
भर माथे पे टीक रहे है राम.
तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को----
सब खीच रहे है राम.
इतने वर्षों का दर्द असह्य,
ना मिला कभी रावण से,
जितना अपनी नगरी मे---
तुम आज पा रहे राम.
मुझे तो यू लगता है जैसे,
टेंट मे बैठे अपनी ही आँसू से---
खुद भीग रहे है राम.
अब तो न्याय की उम्मीद भी बेमानी लगती है,
ये सच कांंपती अँगुली से----
हम लिख रहे है राम.
तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को---
सब खीच रहे है राम.
लेकिन अब ऐसा नही है.
@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758
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