Saturday, 10 September 2022

आज के ही दिन संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत देश की सर्वाधिक लोगो तक पहुंचने वाली राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका "प्रणाम पर्यटन" का अंक आदरणीय प्रदीप श्रीवास्तव सर के सौजन्य से मुझे प्राप्त हुआ था जिसमे मेरी कविता "राम" भी शामिल थी.

    ( राम )

तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को----
सब खींच रहे है राम.

तेरी नगरी मे,
तुम्हें टेंट से ढ़ककर,
मंदिर यहीं बनायेंगे----
बस चीख रहे है राम.

हर चुनाव के मुद्दे मे,
बस भुना रहे अयोध्या को,
कुछ न किया और कुछ न करेंगे,
सच तो ये है कि,
ये नकली भक्त है आपके सारे,
जो अपने-अपने स्वार्थ का चंदन---
भर माथे पे टीक रहे है राम.

तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को----
सब खीच रहे है राम.

इतने वर्षों का दर्द असह्य,
ना मिला कभी रावण से,
जितना अपनी नगरी मे---
तुम आज पा रहे राम.

मुझे तो यू लगता है जैसे,
टेंट मे बैठे अपनी ही आँसू से---
खुद भीग रहे है राम.

अब तो न्याय की उम्मीद भी बेमानी लगती है,
ये सच कांंपती अँगुली से----
हम लिख रहे है राम.
तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को---
सब खीच रहे है राम.

लेकिन अब ऐसा नही है.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

No comments:

Post a Comment