Saturday, 10 September 2022

(वे मेरे गज़ल की किताब)
साजिल्द अभी यही बैठी थी------
वे गज़ल की किताब।
चंद हर्फों पे ही अभी नज़र पड़ी थी,
कि आँख मुंद ली हमने,
साँस में महकी थी अभी----------
वे संदल की खूसबु सी!
आँख खोला तो खाली थी वे कुर्सी,
दराज़ सी जिसपे बैठी थी करीने से---
वे गज़ल की किताब।
मै साजिल्द तलाशुंगा----
हर गली,हर मुहल्ले!
पाऊँगा यकीनन मै इसी शहर में---
वे गज़ल की किताब।
फिर निकाह कर पढुँगा------
वे मुझको थमा देगी ता उम्र के लिये,
वे मेरे गज़ल की किताब।

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