Tuesday, 27 September 2022

(पत्थर न हो सका)
ता उमर रहा बाहर
कभी अन्दर न हो सका।
कुछ प्यास ऐसी थी कि-
मै समन्दर न हो सका।
ऐ रंग,-
कुछ ऐसी मासुमीयत थी मेरी
कि मै कभी पत्थर न हो सका।

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