एैसी सदा को आज के डेली वर्तमान अंकुर मे जगह देने के लिये शुक्रिया निर्मेश के त्यागी भइया।@@@ताज़महल@@@
(1)
ना अब कोई शाहजहाँ,ना दुसरा ताजमहल होगा!
तड़पेगी दुनिया मोहब्बत की हो इससे जुदा,
क्योंकि इस जमीं पे चाहत ने नवाज़े है वे पत्थर,
जिसे तुम लाख तराशो--------
फिर भी ना वे ताज़महल होगा।
अंधेरी रातो में रौशनी यहाँ होती है चाँद सी,
हाय!उस खुदा के घर भी-------
ना एैसा ताज़महल होगा।
लोग छुते है अँगुलियो से लोग छुते है अपनी साँसो से,
पर"रंग" गंदा--------
इससे ना कभी ताज़महल होगा।
(2)
एै चाँदनी नहला तु रौशनी से अपने-------
शायद यहीं कही रुहे मुमताज़ उतरी हो।
तु चुम-चुम ले ज़मी का हर कोई ज़र्रा-----
शायद यहीं कही से रुहे मुमताज़ गुजरी हो।
ये पत्थरे संगेमरमर मोहब्बत की जिंदा तहरीरे है----
पढ़ ले इन्हे क्या पता?वे भी यहीं ठहरी हो।
वे समेटे अपनी हर एक साँस मे गुलाब की खुशबू -------
क्या पता?अपने शहंशाहे आलम के दिल मे उतरी हो।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758
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