एक माँ-----------
अपने दुध-मुँहे बच्चे का पेट भरने के लिये,
लुट के आई है अस्त-व्यस्त,
पुरी रात इसकी बदन पे,
बेरहमी से इसके ग्राहक ने लिखा है,
अपने हवस के जंगली नाखूनो से-----
26 जनवरी।
वे देखो फिर रहा युवा--------
अपनी डिग्रीयो की लाश लिये कांधे पे,
माँ बहन की आबरु चंद चिथड़ो मे लिपटी है,
बाप टी.बी. से खाँस रहा,
कहाँ है इसका वंदे-मातरम कहाँ है इसकी--
26 जनवरी।
देश के रहनुमा वे है,
जिन्हें मादरे तमीज़ तक नही,
वे देखो फहरा के लौटे है तिरंगा,
और उसी जश्न मे खुली शराब की बोतल,
बगल सोफे पे गिरी गाँधी टोपी,
अस्त-व्यस्त खद्दर की धोती,
सच मे एै"रंग" देखो इस देश मे,
इस तरह से भी मनाई जाति है----
26 जनवरी।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आजाद हिन्दुस्तान की छब्बीस जनवरी का।
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