(मां गंगा)
मां गंगा--
अब धरती पे रो रही है!
इसके बेवफ़ा बेटो मे अब,
भगीरथ का किरदार न रहा,
रोज शहर और घर के मैलो से पाट रहे,
उफ!अब गंगा अपने बेटो का प्यार नही,
बल्कि उनके हाथो मिला जहर--
अपने अंदर शमो रही है,
मां गंगा---
अब धरती पे रो रही है।
देखो इसी का असर है कि,
इसके पानी का पुरा बदन,
जहर से नीला पड़ता जा रहा,
तड़पती गंगा मां,
अब बह नही रही---
बल्कि अपनी लाश को बस धो रही है.
मां गंगा----
अब धरती पे रो रही है.
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर ---222002 (उत्तर--प्रदेश)
mo.no.----7800824758
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