पन्द्रह अगस्त के लिये एक ऐसा हकीकतनामा जिसके हम आप सभी गुनहगार है-------------
( मेरा रंग दे बसंती चोला)
सच तो ये है कि हम सभी अपने इस आजाद मुल्क के--बेवफा बेटे है. आजादी के बाद इसके अंतरमन को हमने अग्रेंजो से कही ज्यादा लहू-लुहान व ज़ख्मी किया है. उनकी परिकल्पना मे तो वे लहराता तिरंगा था जिसको आजाद व स्वतंत्र हवा देने के लिये देश के तमाम-तमाम नौजवानो ने, हँसते हुये सीने पे गोलियां खाई, फाँसी के फंदे को चूम लिया. किसी से मोहब्बत नही की, किसी के साथ विवाह के फेरे नही लिये----" बस एक-एक कर मरते और गाते रहे---मेरा रंग दे बसंती चोला".
उन्हें तो बस अपने भारत माँ की आजाद सिंदूरी शाम चाहिये थी--" वे सिन्दूरी शाम जो हजारों लाखो,करोड़ो की माँग और ललाट पे चमके , उनकी शहादत ने इस देश को वे सिन्दूरी शाम तो दी पर हम उस सिन्दूरी शाम को सहेज नही पाये". पन्द्रह अगस्त को बीना किसी वेदना-संवेदना के धूल फाकते उनकी मज़ारो और जली हुई चिताओ के आस-पास थोड़ी सी सफाई कर एक-दो मालाये पहना फिर हम उन्हें पुरे वर्ष ऐसे भूल जाते है जैसे--"विदेशो मे रह रहे ऐन. आर. आई. बेटे अपना देश व अपने माँ-बाप को भूल जाते है ".
पन्द्रह अगस्त आज एक आर्टीफिसियल और चंद लोगों तक सिमटा पर्व बनके रह गया है. अभी अगले ही वर्ष मैने आला-आफिसर की छोटी बिटिया को जब--कजरारे- कजरारे गाने पे थिरकते व नाचते देखा तो मन आहत व पीड़ित हुआ कि ये मासूम छोटी सी बच्ची जिसे जश्ने आजादी के तराने गाने चाहिये उसे उसी के अभिभावक कजरारे जैसे गाने पे थिरकवा रहे थे ये "व्यथित और अपनो के हाथो पीड़ित आजादी नही तो क्या है? ".
जगह-जगह लगाये गये शहर मे हम इन शहीद बेटो की मुर्तियो का हस्र खुद देख सकते हैं, ये यू लगते है कि जैसे---" इस देश के शहीद भीष्म-पितामह को उनके अपनो ने ही तीरो से बिंध दिया हो. वे मरणासन्न सर-सईया पे पड़े आज महाभारत के कालखंड से भी कही ज्यादा दुखी व पीड़ित हो ".
वे दुर बैठी हुई आजादी की चिड़िया बहुत डरी-सहमी है, न जाने क्यूँ उसे लग रहा कि--" कही उसे भी किसी आठ-नौ साल की मासूम बच्ची की तरह निर्मम तरीके से बलात्कार कर मार न दी जाए". ये आजादी तो ना चाही थी इस चिड़िया ने, ये पहले पन्द्रह अगस्त को कितना खुश थी, पर ये आज फिर उस गुलामी के दिनो को याद कर रो रही सिसक रही, उसे अपने वे बेटे और भाई याद आ रहे जो अपनी इस चिड़िया के लिये क्या कुछ न सहा---" वे देखो उसकी भीगी आँखों मे विस्मिल, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू सब तो हैं लेकिन असहाय अब वे भी शायद अपनी इस चिड़िया के लिये अपने ही देश के लोगों को मार कर गा नही सकते-----कि मेरा रंग दे बसंती चोला ".
जय हिंद----जय भारत.
यह क्रन्तिकारी लेख मेरा स्वलखित व अप्रकाशित है.
@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला---जौनपुर पिन नं. 222002 (उत्तर-प्रदेश).
मो. नं ----7800824758.
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