Monday, 30 March 2020

कहानी--(मेरी मुमताज़ )

कहानी----(मेरी मुमताज़ )

 आज भूख और बीमारी से शाहजहां की मुमताज अपनी आखरी हिचकी ले रही. उफ़!  यह हालत है कि मैं अपनी मुमताज की आंखों में शिवा आंसुओ के और कुछ नहीं दे पा रहा. सुना है कि इसी आगरे में मोहब्बत की एक मीनार ताजमहल है जो अपने यहां लोगों को आने और मोहब्बत की कसम खाने के लिए  आवाज देती है और लोग उस सदा पर ताजमहल के आते भी हैं, और बड़ी मोहब्बत से अपनी मुमताज को गुलाब देते व उसके जुड़े में टाकते है. यहां इस शाहजहां खुदा ने दिया भी तो अपनी मुमताज को देने के लिए गुलाब नहीं बल्कि--उन्ही गुलाब के फूलों के वे तमाम कांटे दिए जो उम्र भर हमारी इस मर रही मुमताज के गले के निवाली बन गए. 

 मैं इस आगरा शहर में संगतराशी करता रहा लेकिन इस संगतराशी के काम को कभी इतने पैसे भी नहीं आए कि मैं अपनी गरीबी और मुफलिसी में मर रही मुमताज की खातिर कोई निशानी तराश या खरीद पाया हूं. सभी को अपनी बेगम के साथ हमने चांदनी रात में टहलते अक्सर  देखा है, लेकिन हमारी जिंदगी में चांदनी रात हमें कभी भी मयस्सर नहीं हुई इसी शहर में एक दौलत-ए-शहंशाह ने अपनी बेगम के लिए ताजमहल बनवा दिया वे ताजमहल जो मुझ जैसे तमाम शौहरो की मोहब्बत का मजाक उड़ाता है.

 सुना है कि जिस संगतराश ने अपनी सारी  कला इन बेजुबान संगमरमर के पत्थरों मैं डाल दी थी वे पत्थर आज भी जिंदा से लगते हैं. लेकिन उसी संगतराश की दोनों बांहें शाहजहां ने कटवा दी थी ताकि फिर कोई दुनिया में  दूसरा ताजमहल ना बना सके और ना बना पाए. इसके लिए शाहजहा ने संगतराश की हत्या भी करवा दी थी. यह शायद उसी संगतराश की आह ! थी  जो शाहजहां को भुगतनी पड़ी और अपनी मोहब्बत की उस निशानी को उसी की औलाद ने कैद के झरोखे से ताजिंदगी देखने के लिए मजबूर कर दिया. 

 एक यह शाहजहां है जो अपनी मुमताज को अपनी बांहो में लिए सिसक व तड़प रहा. उफ़! मालिक यह तूने हम जैसे गरीब शाहजहां और मुमताज को क्या जिंदगी दी. वे आखिरी लम्हे भी जैसे अपने इस शाहजहां से नाराज ना हो,  फिर वे कसकर मुझे और मेरी हथेलियों को पकड़ अपनी आखरी हिचकी लेती है. जैसे ही मेरी मुमताज़ अपनी आखिरी हिचकी  के साथ अपना दम तोड़ती है वैसे ही इस शाहजहां की सांसे भी जैसे हमेशा के लिए टूट गई हो. उसकी मुमताज़ का यूँ पकड़े रहना जैसे एक वादा हो कि मै फिर मिलूंगी अगले जन्म तुम्हारी शरिके हयात बनकर मेरे शहंशाह. 

No comments:

Post a Comment